मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् | प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया ||६||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
13 पदअजः
अजन्मा
अपि
यद्यपि
सन्
हूँ
अव्ययात्मा
अविनाशी स्वरूप वाला
भूतानाम्
प्राणियों का
ईश्वरः
ईश्वर
अपि
भी
सन्
हूँ
प्रकृतिम्
प्रकृति को
स्वाम्
अपनी
अधिष्ठाय
अधिष्ठान करके
सम्भवामि
प्रकट होता हूँ
आत्ममायया
अपनी माया से।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
यद्यपि मैं अजन्मा, अविनाशी स्वरूप वाला और सब प्राणियों का ईश्वर हूँ, तो भी अपनी प्रकृति को अधिष्ठान करके, अपनी माया से प्रकट होता हूँ।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यह श्लोक अवतारवाद का मूल मंत्र है। ईश्वर का जन्म साधारण जीवों के समान कर्मबद्ध नहीं होता। वह अपनी इच्छा से, अपनी योगमाया से, अपने भक्तों की रक्षा के लिए प्रकट होता है। वह अजन्मा होते हुए भी जन्म लेता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
यद्यपि मैं अजन्मा, अविनाशी और समस्त प्राणियों का ईश्वर हूँ, फिर भी अपनी प्रकृति को वश में करके, अपनी योगमाया से प्रकट होता हूँ। Though I am unborn, imperishable, and the Lord of all beings, yet I manifest Myself through My own divine power, controlling My material nature.
दिव्य जन्म / Divine Birth
यह श्लोक ईश्वर के दिव्य जन्म (अवतार) की व्याख्या करता है। उनका जन्म कर्मों से बंधा नहीं होता, बल्कि वे अपनी इच्छा और शक्ति से प्रकट होते हैं। This verse explains that the Lord's appearance is not forced by karma but is a voluntary descent for the welfare of the world.