मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत | अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ||७||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
12 पदयदा यदा
जब-जब
हि
निश्चय ही
धर्मस्य
धर्म की
ग्लानिः
हानि
भवति
होती है
भारत
हे भारत
अभ्युत्थानम्
वृद्धि
अधर्मस्य
अधर्म की
तदा
तब
आत्मानम्
अपने को
सृजामि
प्रकट करता हूँ
अहम्
मैं।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे भारत! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यह गीता का सबसे प्रसिद्ध श्लोक है जो अवतार के उद्देश्य को स्पष्ट करता है। ईश्वर के अवतरण का समय संकट का समय होता है – जब धर्म दबने लगता है और अधर्म बढ़ने लगता है। यह ईश्वर की लीला का उद्देश्य बताता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
हे भारत! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ। Whenever and wherever there is a decline in righteousness and a rise in unrighteousness, O Arjuna, I manifest Myself.
अवतार का उद्देश्य / Purpose of Incarnation
यह श्लोक अवतारवाद का मूल सिद्धांत है। ईश्वर संसार की रक्षा के लिए, धर्म की स्थापना के लिए समय-समय पर अवतरित होते हैं। This verse is the foundational principle of incarnation – God descends to establish righteousness and protect the world.