मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् । सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥ २९॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
9 पदभोक्तारम्
भोक्ता (स्वीकार करने वाला)
यज्ञतपसाम्
यज्ञ और तपों का
सर्वलोकमहेश्वरम्
सम्पूर्ण लोकों का महेश्वर
सुहृदम्
सुहृद (हितैषी)
सर्वभूतानाम्
सब प्राणियों का
ज्ञात्वा
जानकर
माम्
मुझे
शान्तिम्
शांति
ऋच्छति
प्राप्त होता है।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
जो पुरुष मुझे सम्पूर्ण यज्ञों और तपों का भोक्ता, समस्त लोकों का महेश्वर, और सब प्राणियों का सुहृद (हितैषी) जान लेता है, वह शांति को प्राप्त होता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यह अध्याय का अन्तिम श्लोक है। भगवान् कृष्ण स्वयं को परमेश्वर, यज्ञ-तपों के भोक्ता और सबके मित्र के रूप में प्रकट करते हैं। उन्हें इस प्रकार जानने वाला शांति को प्राप्त होता है। यह भक्ति का मार्ग है – ईश्वर को सर्वोच्च मानकर उनकी शरण में जाना।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
जो मुझे (कृष्ण को) सभी यज्ञों और तपों का भोक्ता, समस्त लोकों का स्वामी, और सभी प्राणियों का हितैषी मित्र जान लेता है, वह सच्ची शांति को प्राप्त होता है। यह ज्ञान ही मोक्ष का मार्ग है।