मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः । विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः ॥ २८॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
9 पदयतेन्द्रियमनोबुद्धिः
संयत इन्द्रिय, मन और बुद्धि वाला
मुनिः
मुनि
मोक्षपरायणः
मोक्ष परायण
विगतेच्छाभयक्रोधः
इच्छा, भय और क्रोध से रहित
यः
जो
सदा
सदा
मुक्त
मुक्त
एव
ही
सः
वह।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
...इस प्रकार जो मुनि संयत इन्द्रिय, मन और बुद्धि वाला, मोक्ष-परायण, इच्छा, भय और क्रोध से रहित है, वह सदा के लिए मुक्त ही है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
पिछले श्लोक में बताई गई ध्यान-विधि से साधक इन्द्रिय, मन और बुद्धि पर विजय पा लेता है। ऐसा मुनि, जो मोक्ष को ही परम लक्ष्य मानता है और इच्छा, भय, क्रोध से मुक्त है, वह सदा मुक्त ही है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
जिसने इन्द्रियों, मन और बुद्धि को वश में कर लिया है, जो मोक्ष को ही परम लक्ष्य मानता है, और जो इच्छा, भय और क्रोध से रहित है – ऐसा मुनि सदा के लिए मुक्त है।