मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः । प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ ॥ २७॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
13 पदस्पर्शान्
स्पर्शों (इन्द्रिय-विषयों) को
कृत्वा
करके
बहिः
बाहर
बाह्यान्
बाह्य
चक्षुः
दृष्टि
च
और
एव
ही
अन्तरे
बीच में
भ्रुवोः
दोनों भौहों के
प्राणापानौ
प्राण और अपान वायु को
समौ
समान
कृत्वा
करके
नासाभ्यन्तरचारिणौ
नासिका के भीतर विचरण करने वाले।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
बाह्य (सब) विषयों को बाहर ही त्यागकर, दोनों भौहों के बीच दृष्टि को स्थिर करके, नासिका के भीतर विचरण करने वाले प्राण और अपान वायु को समान करके...
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यह श्लोक अगले श्लोक के साथ ध्यान योग की विधि बताता है – इन्द्रियों को विषयों से हटाना, दृष्टि को भृकुटी के बीच स्थिर करना, और श्वास को नियंत्रित करना।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
बाह्य इन्द्रिय-विषयों को मन से बाहर करके, दृष्टि को भौहों के बीच स्थिर करके, और नासिका में विचरण करने वाली श्वास-प्रश्वास (प्राण-अपान) को समान करके... (योगी ध्यान में स्थित होता है)।