मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः । प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः ॥ ३०॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
14 पदसाधिभूत
अधिभूत सहित
अधिदैवम्
अधिदैव सहित
माम्
मुझे
साधियज्ञम्
अधियज्ञ सहित
च
और
ये
जो
विदुः
जानते हैं
प्रयाणकाले
मृत्यु काल में
अपि
भी
च
और
माम्
मुझे
ते
वे
विदुः
जानते हैं
युक्तचेतसः
युक्तचित्त वाले।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
जो मुझे अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ के रूप में जानते हैं, वे युक्तचित्त होकर मृत्युकाल में भी मुझे जानते हैं (अर्थात् मुझे प्राप्त होते हैं)।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
इस श्लोक में भगवान कहते हैं कि जो उनके विभिन्न रूपों (अधिभूत, अधिदैव, अधियज्ञ) को समझ लेते हैं, वे अन्त समय में भी उनमें स्थित रहते हैं और उन्हें प्राप्त होते हैं।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
जो मुझे अधिभूत (भौतिक जगत का आधार), अधिदैव (देवताओं का आधार) और अधियज्ञ (यज्ञों का आधार) के रूप में जानते हैं, वे युक्तचित्त होकर मृत्यु के समय भी मुझे जानते हैं (अर्थात् मुझमें लीन हो जाते हैं)।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
भक्ति और ज्ञान की पराकाष्ठा यह है कि साधक अन्त समय तक ईश्वर में स्थिर रहे। ऐसे योगी को मोक्ष निश्चित है।