श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 7 (ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga))

अध्याय 7 · श्लोक 30

ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 30 3 मिनट का पठन 110 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः । प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः ॥ ३०॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
साधिभूत
अधिभूत सहित
अधिदैवम्
अधिदैव सहित
माम्
मुझे
साधियज्ञम्
अधियज्ञ सहित
च
और
ये
जो
विदुः
जानते हैं
प्रयाणकाले
मृत्यु काल में
अपि
भी
च
और
माम्
मुझे
ते
वे
विदुः
जानते हैं
युक्तचेतसः
युक्तचित्त वाले।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो मुझे अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ के रूप में जानते हैं, वे युक्तचित्त होकर मृत्युकाल में भी मुझे जानते हैं (अर्थात् मुझे प्राप्त होते हैं)।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

इस श्लोक में भगवान कहते हैं कि जो उनके विभिन्न रूपों (अधिभूत, अधिदैव, अधियज्ञ) को समझ लेते हैं, वे अन्त समय में भी उनमें स्थित रहते हैं और उन्हें प्राप्त होते हैं।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जो मुझे अधिभूत (भौतिक जगत का आधार), अधिदैव (देवताओं का आधार) और अधियज्ञ (यज्ञों का आधार) के रूप में जानते हैं, वे युक्तचित्त होकर मृत्यु के समय भी मुझे जानते हैं (अर्थात् मुझमें लीन हो जाते हैं)।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

भक्ति और ज्ञान की पराकाष्ठा यह है कि साधक अन्त समय तक ईश्वर में स्थिर रहे। ऐसे योगी को मोक्ष निश्चित है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 7: ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga)
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ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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