श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 7 (ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga))

अध्याय 7 · श्लोक 29

ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 30 3 मिनट का पठन 113 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये । ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम् ॥ २९॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
जरामरणमोक्षाय
जरा और मरण से मुक्ति के लिए
माम्
मुझे
आश्रित्य
आश्रय लेकर
यतन्ति
प्रयत्न करते हैं
ये
जो
ते
वे
ब्रह्म
ब्रह्म को
तत्
उस
विदुः
जानते हैं
कृत्स्नम्
सम्पूर्ण
अध्यात्मम्
अध्यात्म
च
और
अखिलम्
सम्पूर्ण
कर्म
कर्म को।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो पुरुष जरा और मरण से मुक्ति के लिए मेरी शरण ग्रहण करके प्रयत्न करते हैं, वे उस ब्रह्म, सम्पूर्ण अध्यात्म और समस्त कर्म को जान लेते हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

जो भक्त जरा-मरण से छूटने के लिए भगवान की शरण लेते हैं, वे ब्रह्म, अध्यात्म (आत्मतत्त्व) और कर्म के रहस्य को समझ जाते हैं।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जो पुरुष बुढ़ापे और मृत्यु से मुक्ति के लिए मेरा आश्रय लेकर साधना करते हैं, वे उस परब्रह्म, सम्पूर्ण अध्यात्म (आत्मविद्या) और समस्त कर्म (उनके रहस्य) को जान लेते हैं।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

भक्ति के मार्ग पर चलकर मोक्ष की इच्छा रखने वाले साधक ब्रह्मज्ञान और कर्म के गूढ़ तत्त्व को समझ लेते हैं।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 7: ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga)
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श्लोक 29/30 97% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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