श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 7 (ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga))

अध्याय 7 · श्लोक 28

ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 30 2 मिनट का पठन 113 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् । ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ॥ २८॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

11 पद
येषाम्
जिनके
तु
तो
अन्तगतम्
समाप्त हो गया है
पापम्
पाप
जनानाम्
मनुष्यों के
पुण्यकर्मणाम्
पुण्य कर्म करने वाले
ते
वे
द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता
द्वन्द्व और मोह से मुक्त
भजन्ते
भजते हैं
माम्
मुझे
दृढव्रताः
दृढ़ व्रत वाले।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

परन्तु जिन पुण्यकर्मी मनुष्यों के पाप समाप्त हो गए हैं, वे द्वन्द्व-मोह से मुक्त होकर दृढ़ व्रत से मेरा भजन करते हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

जिनके पाप क्षीण हो गए हैं, वे राग-द्वेष के द्वन्द्व से मुक्त होकर सच्चे मन से भगवान की भक्ति करते हैं।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

परन्तु जो पुण्यात्मा मनुष्य हैं, जिनके समस्त पाप नष्ट हो गए हैं, वे द्वन्द्व (राग-द्वेष) और मोह से मुक्त होकर दृढ़ निश्चय के साथ मेरी भक्ति करते हैं।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

भक्ति के लिए पवित्रता और दृढ़ संकल्प आवश्यक है। पुण्य का संचय ही भक्ति के मार्ग पर अग्रसर करता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 7: ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga)
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श्लोक 28/30 93% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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