श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 7 (ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga))

अध्याय 7 · श्लोक 27

ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 30 2 मिनट का पठन 108 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत । सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप ॥ २७॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

8 पद
इच्छाद्वेषसमुत्थेन
इच्छा और द्वेष से उत्पन्न
द्वन्द्वमोहेन
द्वन्द्वमोह (द्वन्द्वों के मोह) से
भारत
हे भरतवंशी
सर्वभूतानि
समस्त प्राणी
सम्मोहम्
मोह को
सर्गे
जन्म लेते ही
यान्ति
प्राप्त होते हैं
परन्तप
हे परन्तप (शत्रुतापन)।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे भरतवंशी! इच्छा और द्वेष से उत्पन्न द्वन्द्वमोह के कारण समस्त प्राणी जन्म लेते ही मोह को प्राप्त हो जाते हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

संसार में जन्म लेते ही जीव राग-द्वेष के वशीभूत हो जाता है, जिससे वह सत्य से विमुख हो जाता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

हे भरतवंशी! इच्छा और द्वेष से उत्पन्न द्वन्द्वों (जैसे सुख-दुःख, गर्मी-सर्दी) के मोह के कारण समस्त प्राणी जन्म लेते ही मोह को प्राप्त हो जाते हैं।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

राग-द्वेष ही संसार के बन्धन का कारण हैं। इनसे ऊपर उठकर ही सत्य का साक्षात्कार संभव है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 7: ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga)
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श्लोक 27/30 90% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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