मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् । अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ॥ २८॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
20 पदवेदेषु
in the Vedas
यज्ञेषु
in sacrifices
तपःसु
in austerities
च
and
एव
also
दानेषु
in gifts
यत्
which
पुण्यफलम्
fruit of merit
प्रदिष्टम्
is declared
अत्येति
surpasses
तत्
that
सर्वम्
all
इदम्
this
विदित्वा
having known
योगी
the yogi
परम्
supreme
स्थानम्
abode
उपैति
attains
च
and
आद्यम्
primeval.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
वेदों, यज्ञों, तपों और दानों में जो पुण्यफल बताया गया है, उस सबको जानकर योगी उससे अतीत हो जाता है और परम आदि स्थान (ब्रह्म) को प्राप्त होता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यह अध्याय का निगमन है: इस अध्याय के ज्ञान से योगी समस्त वैदिक कर्मों के फलों को पार कर परम पद को प्राप्त होता है। This is the concluding verse of the chapter: by knowing this, the yogi transcends all the fruits of Vedic rituals and attains the supreme abode.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
कृष्ण कहते हैं: वेदों, यज्ञों, तपों और दानों में जो पुण्यफल बताया गया है, उस सबको जानकर योगी उससे अतीत हो जाता है और परम आदि स्थान (ब्रह्म) को प्राप्त होता है। Krishna says: Whatever fruit of merit is declared in the Vedas, sacrifices, austerities, and gifts—having known this, the yogi surpasses all that and attains the supreme, primeval abode.
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
यह अध्याय का सार है: अष्टम अध्याय में वर्णित ज्ञान (अक्षर ब्रह्म, भक्ति योग, दो मार्ग, आदि) को समझ लेने पर साधक समस्त कर्मकाण्डों के फलों को पार कर मोक्ष प्राप्त कर लेता है। यह ज्ञान ही परम साधन है। This is the essence of the chapter: understanding the knowledge described in the eighth chapter (Akshara Brahman, Bhakti Yoga, the two paths, etc.), the seeker transcends all ritualistic fruits and attains liberation. This knowledge itself is the supreme means.