मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन । तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन ॥ २७॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
13 पदन
not
एते
these
सृती
two paths
पार्थ
O Partha
जानन्
knowing
योगी
yogi
मुह्यति
is deluded
कश्चन
anyone
तस्मात्
therefore
सर्वेषु कालेषु
at all times
योगयुक्तः
steadfast in yoga
भव
be
अर्जुन
O Arjuna.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे पार्थ! इन दोनों मार्गों को जानने वाला कोई भी योगी मोहित नहीं होता। इसलिए हे अर्जुन! तू सब समय योग में स्थित रह।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यह श्लोक सीख देता है कि इन मार्गों का ज्ञान होने पर योगी भ्रमित नहीं होता, और सदा योग में स्थित रहने की प्रेरणा देता है। This verse teaches that knowing these paths, a yogi is not deluded, and encourages always being steadfast in yoga.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
कृष्ण कहते हैं: हे पार्थ! इन दोनों मार्गों को जानने वाला कोई भी योगी मोहित नहीं होता। इसलिए हे अर्जुन! तू सब समय योग में स्थित रह। Krishna says: O Partha, knowing these two paths, no yogi is deluded. Therefore, O Arjuna, be steadfast in yoga at all times.
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
यह श्लोक योग के निरंतर अभ्यास का आग्रह करता है। मार्गों का ज्ञान होने पर भी योगाभ्यास आवश्यक है ताकि सही गति सुनिश्चित हो। This verse urges continuous practice of yoga. Even with knowledge of the paths, yogic practice is necessary to ensure the right destination.