🙏 जहाँ नाथ रख दोगे, वहीं मैं रहूँगा
सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें।
(Jahan Nath Rakh Doge, Wahi Main Rahunga) – शरणागति भजन / पूर्ण समर्पण गीत
📝 भजन विवरण
📜 भजन लिरिक्स (हिन्दी में)
जहाँ नाथ रख दोगे, वहीं मैं रहूँगा,
जहाँ ले चलोगे, वहीं मैं चलूँगा।
ये जीवन समर्पित, शरण में तुम्हारे,
तुम ही मेरे सर्वस्व, तुम ही प्राण प्यारे।
तुम्हें छोड़ कर नाथ, मैं किससे कहूँगा,
जहाँ ले चलोगे, वहीं मैं चलूँगा।
॥ अंतरा १ ॥
प्रभु ना कोई उलझन, ना कोई अर्ज़ी,
कर लो, करा लो, तुम्हारी जो मर्ज़ी।
कहना भी होगा तो, तुम्हीं से कहूँगा,
जहाँ ले चलोगे, वहीं मैं चलूँगा।
॥ अंतरा २ ॥
तुम्हारे ही दिन हैं, तुम्हारी ही रातें,
कृपानाथ, सब कुछ है तुम्हारी कृपा से।
सहाओगे नाथ जो भी, उसी से सहूँगा,
जहाँ ले चलोगे, वहीं मैं चलूँगा।
॥ अंतरा ३ ॥
दया नाथ, दयनीय है मेरी अवस्था,
तुम्हारे ही हाथ मेरी है सारी व्यवस्था।
नारायण प्रभु प्रेम, मैं पावन कहूँगा,
जहाँ ले चलोगे, वहीं मैं चलूँगा।
जहाँ नाथ रख दोगे, वहीं मैं रहूँगा,
जहाँ ले चलोगे, वहीं मैं चलूँगा।
✍️ रचनाकार :- परम्परागत / लोक भक्ति (शरणागति रस)
🙏 भजन का अर्थ और संदेश
यह अत्यंत भावपूर्ण शरणागति भजन भक्त के पूर्ण समर्पण और प्रभु की इच्छा पर अटूट विश्वास को दर्शाता है। “जहाँ नाथ रख दोगे, वहीं मैं रहूँगा, जहाँ ले चलोगे, वहीं मैं चलूँगा” – भक्त प्रभु से कहता है कि मैं तेरी इच्छा के बिना कुछ नहीं हूँ; तू जहाँ रखेगा, वहाँ रहूँगा, जिधर ले जाएगा, उधर चलूँगा। यह पूर्ण समर्पण की पराकाष्ठा है।
“ये जीवन समर्पित, शरण में तुम्हारे, तुम ही मेरे सर्वस्व, तुम ही प्राण प्यारे” – भक्त ने अपना जीवन प्रभु की शरण में अर्पित कर दिया है। प्रभु ही उसके सब कुछ हैं – धन, प्राण, सब।
पहले अंतरे में वह कहता है – “प्रभु ना कोई उलझन, ना कोई अर्ज़ी, कर लो, करा लो, तुम्हारी जो मर्ज़ी” – उसे कोई अपनी अलग उलझन या प्रार्थना नहीं है; जो प्रभु की मर्जी, वही उसके लिए स्वीकार्य है। यह “तव मर्ज़ी” का पूर्ण स्वीकार है, जैसे इस्लाम के “इंशाअल्लाह” या हिंदू धर्म में “तेरी इच्छा” का भाव।
दूसरे अंतरे में – “तुम्हारे ही दिन हैं, तुम्हारी ही रातें” – सब कुछ प्रभु का है। वह जो भी सहाएगा, भक्त वही सहेगा। तीसरे अंतरे में वह अपनी दयनीय स्थिति स्वीकार करता है और पूरी व्यवस्था प्रभु के हाथों सौंप देता है।
यह भजन उन सभी के लिए प्रेरणादायक है जो सच्चे मन से प्रभु के प्रति आत्मसमर्पण करना चाहते हैं। यह गीत श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक “यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्” (जो कुछ तू करता है, जो कुछ खाता है, जो कुछ दान करता है – वह सब मुझे अर्पित कर दे) के भाव को सहज भाषा में प्रस्तुत करता है।
🔍 भजन का विशेष महत्त्व
पूर्ण शरणागति का भाव: इस भजन की हर पंक्ति “तेरी इच्छा, मेरी स्वीकृति” की भावना से ओतप्रोत है। भक्त कुछ माँग नहीं रहा, न कोई शिकायत, बस प्रभु की इच्छा पर संतोष। यह शरणागति का उच्चतम स्तर है।
सुख-दुःख में समान भाव: “जहाँ रख दोगे, वहीं रहूँगा” का अर्थ है – सुख में भी, दुःख में भी, संपन्नता में भी, अभाव में भी – भक्त प्रभु को धन्यवाद देता है।
आध्यात्मिक परिपक्वता: यह भजन केवल गीत नहीं, एक जीवन दर्शन है। जो भक्त इसे अपने जीवन में उतार लेता है, वह कभी दुखी नहीं होता, क्योंकि उसने सब कुछ प्रभु पर छोड़ दिया है।
💖 आत्मसमर्पण का संगम
🎯 संदेश
जब भक्त सचमुच प्रभु के हाथों में अपनी बागडोर सौंप देता है, तो उसे किसी भी बात की चिंता नहीं रहती। वह जानता है कि प्रभु की इच्छा ही सर्वश्रेष्ठ है। यही सच्ची शरणागति है।
✨ आस्था का प्रतीक
यह भजन उन सभी भक्तों के लिए प्रेरणा है जो जीवन की चुनौतियों से परेशान हैं। यह उन्हें याद दिलाता है कि सब कुछ प्रभु के हाथ में है, और उनकी इच्छा पर भरोसा रखना ही सबसे बड़ी ताकत है।
🙏 ॐ नमो नारायणाय ।। शरणागति ही सबसे बड़ी उपलब्धि है ।। जय श्री राम ।।
पाठकों के विचार (0)
भक्ति रस चर्चा में भाग लें