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मरते समय मुख से हरि-नाम निकले (सत्संग भजन) लिरिक्स | Marte Samay Mukh Se Hari Naam Nikle Satsang Bhajan Lyrics

256 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Chandan Sah | 2 मिनट पठन समय
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🙏 मरते समय मुख से हरि-नाम निकले – सत्संग भजन

सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें।

(Marte Samay Mukh Se Hari Naam Nikle – Satsang Bhajan)

🎵 तर्ज: “मेरा प्यार वो है कि” (Mera Pyar Wo Hai Ki) – अजामिल का उद्धार, अंतिम समय में हरि-नाम की महिमा

📝 भजन विवरण

🏷️ श्रेणी: सत्संग भजन / हरि-नाम जप / प्रार्थना
🎶 भाव: विश्वास, समर्पण, अंतिम समय में नाम जप का महत्व
🎵 तर्ज: “मेरा प्यार वो है कि”
📀 विशेषता: अजामिल प्रसंग पर आधारित, अंतिम समय में हरि-नाम जप से मुक्ति का संदेश

📜 भजन लिरिक्स (हिन्दी में)

मरते समय मुख से हरि-नाम निकले,
तो समझो कि भव से तरण मिल गया है।
अजामिल से पापी को अंतिम समय में,
प्रभु के चरण में शरण मिल गया है॥

संगों की संगत कुसंगत मिटाए,
प्रभु से मिलन का मार्ग दिखाए।
जिसने किया साधु-संतों की संगत,
सुन्दर उसे आचरण मिल गया है॥
मरते समय मुख से हरि-नाम निकले,
तो समझो कि भव से तरण मिल गया है॥

घड़ी मौत की उसके सर पे जब आई,
तो बेटे “नारायण” की थी रट लगाई।
नारायण ने समझा हमें है बुलाता,
नरक से उसे उद्धरण मिल गया है॥
अजामिल से पापी को अंतिम समय में,
प्रभु के चरण में शरण मिल गया है॥

प्रभु की कृपा जो भी पाता नहीं है,
अंतिम समय नाम आता नहीं है।
स्वासों में निसिदिन जो भी जपेगा,
जीवन का उसको मर्म मिल गया है॥
मरते समय मुख से हरि-नाम निकले,
तो समझो कि भव से तरण मिल गया है॥

🎵 रचनाकार : लोक परम्परा / सत्संग भजन

🙏 भजन का अर्थ और संदेश

यह अत्यंत प्रभावशाली सत्संग भजन अजामिल के प्रसंग पर आधारित है, जो बताता है कि अंतिम समय में हरि-नाम जपने से मुक्ति मिल जाती है। “मरते समय मुख से हरि-नाम निकले, तो समझो कि भव से तरण मिल गया है” – यदि मृत्यु के समय मुँह से हरि-नाम निकल जाए, तो समझ लो कि जन्म-मरण के सागर (भव) से पार उतरने (तरण) का साधन मिल गया।

“अजामिल से पापी को अंतिम समय में, प्रभु के चरण में शरण मिल गया है” – पुराणों के अनुसार अजामिल ने अपने पुत्र “नारायण” को पुकारा था, और भगवान ने उसे मोक्ष दे दिया। यह बताता है कि अंतिम समय में भी सच्चे मन से नाम जपने पर प्रभु की शरण मिलती है।

पहले अंतरे में – संतों की संगति (सत्संग) कुसंगति को मिटाती है और प्रभु से मिलन का मार्ग दिखाती है। जिसने साधु-संतों की संगत की, उसे सुंदर आचरण मिल गया।

दूसरे अंतरे में – अजामिल के प्रसंग का सीधा उल्लेख। मृत्यु की घड़ी आने पर उसने अपने बेटे “नारायण” को पुकारा, और भगवान नारायण ने समझा कि वह हमें बुला रहा है – इस प्रकार उसे नरक से उद्धार मिल गया।

तीसरे अंतरे में – जो प्रभु की कृपा नहीं पाता, उसके अंतिम समय में नाम नहीं आता। इसलिए हर सांस में, नित्य-प्रति (निसिदिन) नाम जपना चाहिए – तभी जीवन का मर्म (सार) मिलता है।

यह भजन सिखाता है कि कभी भी, यहाँ तक कि मृत्यु के अंतिम क्षणों में भी, हरि-नाम जपने से मुक्ति मिल सकती है। लेकिन सच्ची भक्ति तो जीवनभर नाम जपने में ही है।

🔍 भजन का विशेष महत्त्व

अजामिल प्रसंग: यह भागवत पुराण का प्रसिद्ध प्रसंग है जिसमें एक ब्राह्मण अजामिल ने पापों में जीवन बिताया, लेकिन अंतिम समय में अपने पुत्र नारायण का नाम लेते हुए मरे, और भगवान के दूतों ने उसे मोक्ष दिलाया।

“तरण” का अर्थ: तरण का अर्थ है पार करना, उद्धार। भवसागर (जन्म-मरण के समुद्र) से पार होना ही मोक्ष है।

सत्संग की महिमा: “संगों की संगत कुसंगत मिटाए” – सत्संग (अच्छी संगति) बुरी संगति को मिटा देती है और प्रभु-प्राप्ति का मार्ग दिखाती है।

💖 हरि-नाम की महिमा

🎯 संदेश

चाहे जीवन भर पाप ही क्यों न किए हों, यदि अंतिम समय में सच्चे मन से हरि-नाम निकल जाए, तो भगवान अपने भक्त का उद्धार करते हैं। इसलिए कभी निराश न हों – हरि-नाम जपते रहो।

✨ आस्था का प्रतीक

यह भजन हर भक्त को यह विश्वास दिलाता है कि भगवान का नाम सबसे बड़ा सहारा है। अजामिल जैसे पापी का भी उद्धार हुआ – तो हम क्यों न करें?

🙏 ॐ नमो नारायणाय ।। हरि-नाम की जय ।। अजामिल उद्धार प्रसंग ।।

॥ इति सत्संग भजनम् ॥
॥ मरते समय मुख से हरि-नाम निकले, तो समझो कि भव से तरण मिल गया है – अजामिल से पापी को अंतिम समय में प्रभु के चरण में शरण मिल गया है ॥
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सनातन संस्कृति एवं प्रामाणिक संपादन

यह भजन/आरती लिरिक्स भक्तिलोक संपादकीय मंडल द्वारा उपलब्ध प्रामाणिक स्रोतों के संदर्भ में समीक्षा एवं संपादन के बाद प्रकाशित किया गया है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 10 Aug 2026

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