श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 1 (अर्जुन विषाद योग (Arjuna Vishada Yoga))

अध्याय 1 · श्लोक 28

अर्जुन विषाद योग (Arjuna Vishada Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 47 43 मिनट का पठन 109 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् | दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ||२८||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
कृपया
करुणा से
परया
अत्यधिक
आविष्टः
आविष्ट
विषीदन्
विषाद करते हुए
इदम्
यह
अब्रवीत्
बोला
दृष्ट्वा
देखकर
इमम्
इस
स्वजनम्
अपने लोगों को
कृष्ण
हे कृष्ण
युयुत्सुम्
युद्ध की इच्छा से
समुपस्थितम्
उपस्थित।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

अत्यधिक करुणा से आविष्ट और विषाद करते हुए अर्जुन ने यह कहा: हे कृष्ण! युद्ध की इच्छा से उपस्थित अपने इन स्वजनों को देखकर ...

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

"कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् | दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ||२८||"

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आध्यात्मिक प्रस्तावना, सांस्कृतिक महत्व और ब्रह्मांडीय चेतना

सनातन संस्कृति और वैदिक दर्शन के सर्वोच्च ग्रंथ 'श्रीमद्भगवद्गीता' के प्रथम अध्याय (अर्जुनविषादयोग) का यह अट्ठाइसवाँ श्लोक मानव मनोविज्ञान, पारिवारिक मोह और परम कर्तव्य के बीच उत्पन्न होने वाले अंतरद्वंद्व का अत्यंत सजीव और मर्मस्पर्शी चित्रण प्रस्तुत करता है। जब हम महाभारत के कुरुक्षेत्र के उस ऐतिहासिक रणक्षेत्र की कल्पना करते हैं, जहाँ दोनों ओर से शंखनाद हो चुका है, व्यूह रचनाएँ बन चुकी हैं, और मृत्यु साक्षात तांडव करने को उद्यत है, तब एक महायोद्धा, एक वीर क्षत्रिय यानी अर्जुन का मानस किस प्रकार विचलित होता है, इसका प्रत्यक्ष दर्शन हमें इस श्लोक में मिलता है।

यह श्लोक केवल दो सेनाओं के बीच युद्ध की शुरुआत का विवरण मात्र नहीं है, बल्कि यह प्रत्येक मनुष्य के जीवन में आने वाले उन संकटपूर्ण मोड़ों का प्रतीक है जहाँ व्यक्ति अपने प्रियजनों, कर्तव्यों, और नैतिक मूल्यों के बीच स्वयं को असमंजस की स्थिति में पाता है। अर्जुन की यह करुणा, उनका यह विषाद, और उनकी यह व्याकुलता वस्तुतः संपूर्ण जीवात्मा की उस अवस्था को दर्शाती है जो भौतिक बंधनों, मोह और अज्ञान के आवरण से घिरकर अपनी वास्तविक दिव्यता को भूल जाती है। जब भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में अर्जुन अपने शस्त्र गिराकर बैठ जाते हैं, तो वह केवल एक मित्र के आगे हार नहीं मान रहे हैं, बल्कि वे संपूर्ण जीव की ओर से परम परमात्मा के शरणागत होने का प्रथम ऐतिहासिक कदम उठा रहे हैं।

इस श्लोक का सांस्कृतिक और दार्शनिक महत्व इस बात में निहित है कि यह गीता के ज्ञान प्राप्ति के मार्ग को प्रशस्त करता है। बिना विषाद और बिना सच्चे ज्ञान की पिपासा के, गीता के महान उपदेशों का अवतरण संभव ही नहीं था। अर्जुन की यह करुणा ही वह उपजाऊ भूमि बनी जिस पर भगवान श्रीकृष्ण ने कर्मयोग, भक्तियोग और ज्ञानयोग के अमृत बीजों को बोया। इसलिए, यह श्लोक केवल साहित्य का एक अंश नहीं, बल्कि मानव चेतना के रूपांतरण का एक दिव्य द्वार है जो हर साधक को आत्म-विश्लेषण और कर्तव्य पालन की प्रेरणा देता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

वैदिक परंपरा के अनुसार श्लोकों का उच्चारण शुद्ध स्वर, लय और भक्ति भाव के साथ करना चाहिए। यहाँ इस परम पवित्र श्लोक का प्रामाणिक पाठ प्रस्तुत है:

अर्जुन उवाच
कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् ।
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ॥ २८ ॥

श्लोक पाठ की सरल विधि एवं नियम:
  • प्रातःकाल ब्रह्म बेला में स्नान उपरांत शुद्ध वस्त्र धारण कर पवित्र आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  • अपने इष्टदेव भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण करें और उनके समक्ष घी का दीपक प्रज्वलित करें।
  • इस श्लोक का उच्चारण करते समय प्रत्येक शब्द के दीर्घ और ह्रस्व स्वरों का विशेष ध्यान रखें।
  • पाठ के पश्चात मन ही मन भगवान से प्रार्थना करें कि वे आपके जीवन से अज्ञान और विषाद का अंधकार दूर करें।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

श्रीमद्भगवद्गीता के प्रत्येक शब्द में अथाह आध्यात्मिक गहराई छिपी है। आइए इस श्लोक के प्रत्येक पद का सूक्ष्मता से विश्लेषण करते हैं:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
कृपया करुणा से, दया से, अत्यधिक मोहजनित ममता से यह वह भौतिक करुणा है जो अज्ञान से उत्पन्न होती है और कर्तव्य कर्म से विचलित करती है।
परयाविष्टः अत्यंत अभिभूत, पूरी तरह से घिरे हुए, समाहित अर्जुन की चेतना इस समय पूरी तरह से शोक और मोह के अंधकार से आच्छादित हो चुकी है।
विषीदन् शोक करते हुए, विषाद में डूबे हुए, दुखी मन से मन की वह अवस्था जहाँ बाहरी विजय भी आंतरिक पराजय और भारीपन का अनुभव कराती है।
इदम् इस प्रकार, यह वचन वह वाणी जो सीधे हृदय के गहरे आघात और आंतरिक संघर्ष से बाहर निकलती है।
अब्रवीत् कहा, बोले भगवान श्रीकृष्ण के समक्ष अपनी दुर्बलता और विवशता को स्वीकार करने की अभिव्यक्ति।
दृष्ट्वा देखकर, अवलोकन करके नेत्रों द्वारा सामने उपस्थित दृश्यों को देखकर जब मस्तिष्क और हृदय पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।
इमम् इन सबको, सामने खड़े हुए इन लोगों को वे संबंधी जो कल तक आत्मीय थे, आज युद्धभूमि में आमने-सामने खड़े हैं।
स्वजनम् अपने जनों को, कुटुंबियों को, संबंधियों को रक्त संबंधों और पारिवारिक बंधनों का वह मोह जो मोक्ष के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा बनता है।
कृष्ण हे कृष्ण! (भगवान श्रीकृष्ण को संबोधित करते हुए) समस्त ब्रह्मांड के आकर्षण और ज्ञान के स्रोत भगवान को अपनी पीड़ा का साक्षी बनाना।
युयुत्सुम् युद्ध करने के लिए उत्सुक, लड़ने को तैयार धर्म और अधर्म के इस महासमर में अपने ही जनों का आक्रामकता से भरा हुआ रूप।
समुपस्थितम् भली-भांति उपस्थित, सामने आए हुए नियति द्वारा खड़ा किया गया वह विकट प्रसंग जिससे चाहकर भी बचा नहीं जा सकता।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

महाभारत के युद्ध का यह प्रसंग महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित उस महाकाव्य का हिस्सा है जिसे पंचम वेद माना जाता है। कौरवों और पांडवों के बीच का यह संघर्ष केवल दो कुलों का राजनीतिक विवाद नहीं था, बल्कि यह धर्म ( righteousness) और अधर्म (unrighteousness) के बीच का ब्रह्मांडीय युद्ध था। जब दुर्योधन के अड़ियल रवैये और अहंकार के कारण शांति के सारे प्रयास विफल हो गए, तब अंततः कुरुक्षेत्र की धरा पर शंखनाद हुआ।

कौरव सेना में भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य जैसे गुरुजन और कर्ण, दुर्योधन जैसे योद्धा उपस्थित थे, तो दूसरी ओर पांडव सेना धर्म की रक्षा के लिए तत्पर थी। युद्ध के ठीक आरंभ में, जब अर्जुन ने अपने सारथी भगवान श्रीकृष्ण से अपने रथ को दोनों सेनाओं के बीच ले चलने का अनुरोध किया, तो उन्होंने अपने परिजनों, गुरुओं, भाइयों और मित्रों को आमने-सामने युद्ध के लिए तत्पर देखा। इसी दृश्य ने अर्जुन के भीतर एक भयंकर मानसिक उथल-पुथल पैदा कर दी।

यह पृष्ठभूमि हमें सिखाती है कि जीवन में कई बार ऐसे क्षण आते हैं जब हमारे सामने हमारे अपने ही लोग अधर्म के पक्ष में खड़े होते हैं और हमें उनके विरुद्ध खड़ा होना पड़ता है। अर्जुन का यह विषाद सनातन इतिहास का वह ऐतिहासिक मोड़ है जहाँ मानवीय दुर्बलता अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाती है, ताकि इसके बाद आने वाला गीता का दिव्य ज्ञान अपनी संपूर्ण गरिमा के साथ प्रकट हो सके। महर्षि वेदव्यास ने इस प्रसंग के माध्यम से यह संदेश दिया है कि आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग पर चलने से पहले मनुष्य को अपने मोह, अहंकार और संकीर्ण पारिवारिक आसक्तियों की पराजय का सामना करना ही पड़ता है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक और इसके मर्म को आत्मसात करने से जीवन में अद्भुत सकारात्मक परिवर्तन आते हैं। इसके नियमित मनन और पठन से प्राप्त होने वाले प्रमुख लाभ निम्नलिखित हैं:

१. मानसिक शांति और एकाग्रता

अर्जुन के मानसिक द्वंद्व और उसके समाधान के अध्ययन से व्यक्ति को अपने जीवन के तनावों और दुविधाओं से उबरने की मानसिक शक्ति मिलती है, जिससे एकाग्रता बढ़ती है।

२. सकारात्मक ऊर्जा का संचार

श्लोक के नियमित उच्चारण से शरीर और मन के चारों ओर एक उच्च कोटि की दिव्य और सकारात्मक ऊर्जा का आवरण (Aura) बनता है, जो नकारात्मक विचारों को दूर रखता है.

३. कर्मिक शुद्धि (Karmic Purification)

भगवान के मुख से निकले वचनों और उनके परिवेश का स्मरण करने से पूर्व जन्मों के संचित अशुभ कर्मों का प्रभाव क्षीण होता है और चेतना शुद्ध होती है।

४. भगवद कृपा की प्राप्ति

जब साधक अर्जुन की भांति अपनी कमजोरियों को ईश्वर के समक्ष समर्पित करता है, तो उसे भगवान श्रीकृष्ण की अहेतुकी करुणा और मार्गदर्शन की प्राप्ति होती है।

५. मोह और आसक्ति से मुक्ति

यह श्लोक हमें सिखाता है कि पारिवारिक और सांसारिक मोह किस प्रकार व्यक्ति की बुद्धि को भ्रमित कर सकते हैं। इसके निरंतर मनन से अनासक्ति का भाव जागृत होता है।

६. निर्णय लेने की क्षमता में वृद्धि

जीवन के कठिन दौर में जब व्यक्ति कर्तव्यविमूढ हो जाता है, तब गीता का यह ज्ञान संकट के समय सही और धर्मसम्मत निर्णय लेने की शक्ति प्रदान करता है।

७. भय और चिंता का निवारण

मृत्यु, हानि और पराजय का जो भय अर्जुन के मन में था, वही भय आम मनुष्य के जीवन में भी होता है। इस श्लोक का अध्ययन उस अज्ञात भय से मुक्ति दिलाता है।

८. आत्मबोध और विनम्रता

अहंकार का त्याग कर अपनी कमजोरी को स्वीकारना ही आध्यात्मिक प्रगति का पहला सोपान है। यह श्लोक साधक के भीतर प्रगाढ़ विनम्रता और आत्मबोध जगाता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in के इस प्रतिष्ठित मंच पर प्रस्तुत यह आलेख सनातन धर्म के मूल ग्रंथों, महर्षि वेदव्यास रचित श्रीमद्भगवद्गीता (महाभारत के भीष्म पर्व से उद्धृत), तथा आचार्यों की प्रामाणिक टीकाओं (जैसे आदि शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदास और स्वामी विवेकानंद के दर्शन) के गहन अध्ययन के पश्चात तैयार किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक वेदों, पुराणों और उपनिषदों की शुद्ध, सनातन और बिना किसी मिलावट के आध्यात्मिक धरोहर को पहुँचाना है।

प्रत्येक श्लोक के शब्दार्थ, भावार्थ और ऐतिहासिक संदर्भों को आधुनिक जीवनशैली के परिप्रेक्ष्य में अत्यंत सरल हिंदी भाषा में ढाला गया है ताकि आज की युवा पीढ़ी और गंभीर आध्यात्मिक साधक दोनों ही वेदों के इस शाश्वत प्रकाश से लाभान्वित हो सकें। यदि आपके मन में इस श्लोक से संबंधित कोई भी दार्शनिक जिज्ञासा है, तो आप हमारे विशेषज्ञ पैनल से संपर्क कर सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

उत्तर: श्रीमद्भगवद्गीता के प्रथम अध्याय का नाम ही 'अर्जुनविषादयोग' है। यद्यपि विषाद कोई योग नहीं है, फिर भी इसे 'योग' इसलिए कहा गया क्योंकि अर्जुन की यह व्याकुलता और उनका यह मानसिक संकट ही वह माध्यम बना जिसके द्वारा जीव और परमात्मा का मिलन (योग) संभव हुआ।

उत्तर: 'स्वजन' का अर्थ है अपने रक्त संबंधी, भाई, गुरु, दादा और परिवार के अन्य सदस्य। कुरुक्षेत्र में जब अर्जुन ने इन सभी को अपने सामने युद्ध के लिए मरने-मारने को तत्पर देखा, तो उनकी पुरानी पारिवारिक आसक्ति (मोह) जाग उठी। उन्हें यह चिंता सताने लगी कि इन अपनों को मारकर उन्हें क्या सुख मिलेगा। यही मोह उनके विषाद का मुख्य कारण बना।

उत्तर: बिल्कुल नहीं। शास्त्रीय दृष्टि से विषाद तब सकारात्मक बन जाता है जब वह व्यक्ति को अपने भीतर झाँकने और सत्य को खोजने के लिए प्रेरित करे। अर्जुन का विषाद साधारण दुःख नहीं था, बल्कि वह जीवन के अंतिम सत्यों को जानने की एक तीव्र छटपटाहट थी, जिसने उन्हें गीता का ज्ञान प्राप्त करने का अधिकारी बनाया।

उत्तर: जब भी हमारे जीवन में अत्यधिक मानसिक तनाव, निर्णय लेने में असमंजस या पारिवारिक मोह के कारण संकट की स्थिति आए, तब हमें इस श्लोक का स्मरण करना चाहिए। यह हमें यह सिखाता है कि संकट के समय विचलित होने के बजाय अपने आराध्य या विवेक रूपी सारथी (श्रीकृष्ण) के चरणों में अपने संशय समर्पित कर देने चाहिए।

उत्तर: हाँ, श्रीमद्भगवद्गीता के प्रथम अध्याय का पाठ करने से व्यक्ति को यह समझने में सहायता मिलती है कि मानव मन किस प्रकार भ्रमित होता है। यह पाठ हमारे अपने भीतर छिपे अहंकार, भय और मोह का आईना दिखाता है, जिससे आत्म-सुधार (Self-introspection) का मार्ग प्रशस्त होता है।

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करुणा का उद्रेक / Outpouring of Compassion

अर्जुन के हृदय में युद्ध के परिणामों के विचार से करुणा उमड़ पड़ी। Arjuna's heart melted at the thought of the consequences of war.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 1: अर्जुन विषाद योग (Arjuna Vishada Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 28 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 28/47 60% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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