श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 1 (अर्जुन विषाद योग (Arjuna Vishada Yoga))

अध्याय 1 · श्लोक 29

अर्जुन विषाद योग (Arjuna Vishada Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 47 37 मिनट का पठन 102 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति | वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ||२९||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
सीदन्ति
शिथिल हो रहे हैं
मम
मेरे
गात्राणि
अंग
मुखम्
मुख
च
और
परिशुष्यति
सूख रहा है
वेपथु
कम्पन
च
और
शरीरे
शरीर में
मे
मेरे
रोमहर्ष
रोमांच
च
और
जायते
हो रहा है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

मेरे अंग शिथिल हो रहे हैं, मुख सूख रहा है, शरीर में कम्पन हो रहा है और रोमांच खड़ा हो रहा है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

सनातन संस्कृति और वैदिक दर्शन में श्रीमद्भगवद्गीता का स्थान केवल एक धार्मिक ग्रंथ का नहीं, बल्कि मानव चेतना के रूपांतरण के महाग्रंथ के रूप में है। जब हम महाभारत के रणक्षेत्र कुरुक्षेत्र की ओर दृष्टि डालते हैं, तो हमें धर्म और अधर्म के बीच का वह महान द्वंद्व दिखाई देता है जो केवल बाहर नहीं, बल्कि हर मनुष्य के अंतःकरण में निरंतर चल रहा है। अर्जुन का यह विख्यात श्लोक—"सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति..."—केवल एक योद्धा की तात्कालिक मानसिक शिथिलता का वर्णन नहीं है, बल्कि यह उस संपूर्ण मानवीय त्रासदी और अस्तित्वगत संकट (Existential Crisis) का सजीव दस्तावेज है, जिसका सामना जीवन के किसी न किसी मोड़ पर हर संवेदनशील जीव को करना पड़ता है। जब कर्तव्य की पुकार और मोहग्रस्त भावनाओं के बीच भयंकर संघर्ष होता है, तब शरीर और मन किस प्रकार प्रतिक्रिया देते हैं, इसका ऐसा जीवंत और मनोवैज्ञानिक रूप से सटीक चित्रण विश्व साहित्य में अन्यत्र दुर्लभ है।

इस श्लोक के माध्यम से महर्षि वेद व्यास ने यह दर्शाने का प्रयास किया है कि जब अज्ञान, शोक और मोह व्यक्ति की बुद्धि को आच्छादित कर लेते हैं, तब किस प्रकार उसके भौतिक अंग भी कार्य करना बंद कर देते हैं। अर्जुन, जो गांडीवधारी और अपराजेय योद्धा हैं, वे भी जब अपने स्वजनों को विपक्ष में खड़ा देखते हैं, तो उनका अहंकार और उनका भौतिक बल दोनों चरमरा उठते हैं। यह स्थिति हमें यह सिखाती है कि भौतिक पराक्रम चाहे जितना भी बड़ा क्यों न हो, यदि वह आत्मज्ञान और आधिदैविक दृष्टि से विहीन है, तो वह क्षणभर में ढह सकता है। भवतलोक (Bhaktilok.in) के इस पावन मंच पर हम इसी श्लोक के माध्यम से अर्जुन के आंतरिक अवसाद, शारीरिक लक्षणों के पीछे छिपे दार्शनिक सत्यों, और भगवान श्रीकृष्ण द्वारा प्रदत्त उस महान संजीवनी के स्रोतों का अनुसंधान करेंगे जो मनुष्य को हर प्रकार के कायरतापूर्ण विषाद से उबारकर कर्मपथ पर अग्रसर होने की प्रेरणा देती है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

अथ श्रीमद्भगवद्गीता प्रथमोध्यायः (विषादयोग) — श्लोक २९

सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति।

वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते॥ २९॥


पाठ विधि एवं सस्वर उच्चारण का अनुष्ठान: इस श्लोक का पाठ करने से पूर्व मन को शांत करना अति आवश्यक है। प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में स्नान कर, शुद्ध वस्त्र धारण करके पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। दीप प्रज्वलित कर भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण करें। श्लोक का उच्चारण करते समय प्रत्येक पद की मात्रा और स्वर का विशेष ध्यान रखें ताकि इसके आंतरिक स्पंदन से मन में एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार हो सके। यह श्लोक हमें सिखाता है कि जब भी जीवन में अत्यधिक भय या शोक की स्थिति आए, तो उसे छिपाने के बजाय स्वीकार करते हुए भगवान की शरण में जाना चाहिए।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक के प्रत्येक शब्द में गहन मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक अर्थ समाहित हैं। आइए, सारणी के माध्यम से इनका विस्तृत विश्लेषण करें:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
सीदन्ति (Seedanti) शिथिल हो रहे हैं / बैठ रहे हैं अहंकार और मोह के प्रभाव से शारीरिक ऊर्जा का क्षय होना और आंतरिक शक्ति का टूटना।
मम (Mama) मेरे 'मम' यानी ममता और आ सकती का भाव, जो समस्त दुखों और बंधनों का मूल कारण है।
गात्राणि (Gatrani) अंग / शरीर के विभिन्न भाग कर्मेन्द्रियाँ और ज्ञानेन्द्रियाँ, जो आत्मा के आदेश पर चलती हैं किंतु मोहवश अचेत हो रही हैं।
मुखम् च (Mukham Cha) और मुख संवाद और अभिव्यक्ति का केंद्र, जो आंतरिक भय के कारण मौन और शुष्क हो रहा है।
परिशुष्यति (Parishushyati) पूरी तरह सूख रहा है प्राणवायु और रस का सूखना, जीवन के उत्साह का अचानक समाप्त हो जाना।
वेपथुः च (Vepathush Cha) और कंपकंपी / थरथराहट तंत्रिका तंत्र (Nervous System) पर अत्यधिक भय और असमंजस का गंभीर प्रभाव।
शरीरे मे (Sharire Me) मेरे शरीर में भौतिक उपादान, जिसे अर्जुन 'मैं' मान बैठे हैं, जबकि वास्तविक आत्मा अछूती है।
रोमहर्षः च (Romaharshash Cha) और रोंगटे खड़े होना अत्यधिक चिंता, भय या अत्यधिक संवेदनशीलता के कारण शारीरिक संकुचन की स्थिति।
जायते (Jaayate) उत्पन्न हो रहा है / प्रकट हो रहा है मनोстоянияों का भौतिक शरीर पर प्रत्यक्ष रूप से प्रकट होना और दृश्यमान होना।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

इस श्लोक की पृष्ठभूमि महाभारत के महायुद्ध के ठीक पूर्व की है। कौरव और पांडव सेनाएं कुरुक्षेत्र के खुले मैदान में आमने-सामने खड़ी थीं। शंखनाद हो चुके थे, युद्ध के नगाड़े बज रहे थे, और चारों ओर मृत्यु का भयानक तांडव अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा था। ऐसे भीषण और ऐतिहासिक क्षण में, अर्जुन ने अपने सारथी भगवान श्रीकृष्ण से अपने रथ को दोनों सेनाओं के मध्य में ले जाकर खड़ा करने का अनुरोध किया। अर्जुन देखना चाहते थे कि इस युद्ध में उनके विपक्ष में लड़ने के लिए कौन-कौन से दुराचारी योद्धा उपस्थित हुए हैं।

जैसे ही अर्जुन की दृष्टि विपक्ष में खड़े अपने ही गुरुजनों (द्रोणाचार्य, कृपाचार्य), पितामह (भीष्म), भाइयों, चचेरे भाइयों, मित्रों और संबंधियों पर पड़ती है, उनके भीतर का योद्धा अचानक शांत हो जाता है और एक साधारण, ममत्व से घिरा हुआ मनुष्य जाग उठता है। महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत के इस अंश में यह दर्शाया गया है कि किस प्रकार बाहरी परिस्थितियां जब हमारे आंतरिक संस्कारों और मोह से टकराती हैं, तो व्यक्ति किस कदर विचलित हो जाता है। अर्जुन के हाथ से गांडीव धनुष फिसलने लगता है, उनका चित्त भ्रमित हो जाता है, और वे भगवान श्रीकृष्ण से कहते हैं कि वे अपनों का वध करके किसी भी प्रकार के राज्य सुख या विजय की इच्छा नहीं रखते।

यह प्रसंग केवल दो पक्षों का युद्ध नहीं है, बल्कि यह उस शाश्वत आंतरिक संघर्ष का प्रतीक है जो हर मनुष्य के जीवन में तब उत्पन्न होता है जब उसे अपने धर्म (कर्तव्य) और अपने मोह (संबंधों की आसक्ति) के बीच किसी एक का चुनाव करना पड़ता है। अर्जुन का यह शारीरिक कंपन और विषाद इस बात का प्रमाण है कि जब तक व्यक्ति मोह के आवरण से घिरा रहता है, तब तक बड़े से बड़ा वीर भी आंतरिक रूप से कायर और असहाय महसूस कर सकता है। इस संकट से उबारने के लिए ही श्रीमद्भगवद्गीता के अमर ज्ञान का प्रादुर्भाव हुआ, जो आज भी संपूर्ण मानवता के लिए मार्गदर्शक प्रकाश स्तंभ बना हुआ है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस प्रकार के श्लोकों का अध्ययन, मनन और चिंतन करने से जीवन में अद्भुत सकारात्मक परिवर्तन आते हैं:

1. मानसिक संतुलन और स्थिरता

जीवन की कठिन परिस्थितियों या संकट के समय जब मन विचलित होने लगे, तब इस श्लोक का स्मरण करने से यह बोध होता है कि भय और विषाद मानवीय स्वभाव का हिस्सा हैं, जिन पर आत्मबल से विजय प्राप्त की जा सकती है।

2. अस्तित्वगत संकट (Existential Crisis) से मुक्ति

यह श्लोक हमें सिखाता है कि मोह और अवसाद के क्षणों में अपनी दुर्बलताओं को स्वीकार कर सही ज्ञान की शरण में जाना चाहिए, जिससे जीवन के बड़े से बड़े भ्रम दूर हो जाते हैं।

3. सकारात्मक ऊर्जा और औरा (Aura) का विकास

गीता के वचनों और श्लोकों का नियमित सस्वर पाठ करने से शरीर और मन के चारों ओर एक सुरक्षात्मक आध्यात्मिक आवरण (Positive Aura) का निर्माण होता है, जो नकारात्मक शक्तियों को रोकता है।

4. कर्मयोग की प्रेरणा

अर्जुन के इस विषाद के माध्यम से हमें यह समझने में सहायता मिलती है कि कर्तव्य पथ से विमुख होना समाधान नहीं है, बल्कि सभी बाधाओं को पार करते हुए अपने धर्म का पालन करना ही श्रेष्ठ मार्ग है।

5. शारीरिक और मानसिक समन्वय

श्लोक के गहन अध्ययन और ध्यान से तंत्रिका तंत्र (Nervous System) शांत होता है, जिससे भयजनित शारीरिक प्रतिक्रियाओं पर नियंत्रण पाने में मानसिक सहायता मिलती है।

6. आत्मनिरीक्षण की क्षमता में वृद्धि

यह श्लोक पाठक को अपने ही भीतर झांकने के लिए प्रेरित करता है ताकि वह पहचान सके कि उसके जीवन में कौन सी 'आसक्तियां' उसकी वास्तविक शक्ति को कमजोर कर रही हैं।

7. कार्मिक शुद्धि (Karmic Purification)

सच्चे मन से गीता के उपदेशों का चिंतन करने से मन के विकारों (काम, क्रोध, लोभ, मोह) का शमन होता है, जिससे चित्त शुद्ध और निर्मल बनता है।

8. भगवत्कृपा की प्राप्ति

जो भक्त अपनी विनम्रता और शरणागति के भाव के साथ भगवान के ज्ञान को आत्मसात करता है, उसे भगवान श्रीकृष्ण की असीम अनुकंपा और मार्गदर्शन सहज ही प्राप्त होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के अंतर्गत, भवतलोक (Bhaktilok.in) यह सुनिश्चित करता है कि हमारे पाठकों तक प्राचीन वेदों, पुराणों, और उपनिषदों का संदेश पूरी शुद्धि, प्रामाणिकता और अकादमिक गरिमा के साथ पहुँचे। श्रीमद्भगवद्गीता के प्रथम अध्याय (अर्जुनविषादयोग) के इस २९वें श्लोक की व्याख्या करते समय हमने पारंपरिक टीकाओं—विशेष रूप से आदि शंकराचार्य, स्वामी रामानुज और आधुनिक संतों के दृष्टिकोण—का सूक्ष्म अध्ययन किया है। हमारी यह सामग्री पाठकों की आध्यात्मिक जिज्ञासा को शांत करने और उन्हें सनातन धर्म के वास्तविक दर्शन से जोड़ने के लिए पूरी निष्ठा के साथ संकलित की गई है। इसमें प्रयुक्त सभी संस्कृत पद और उनके अर्थ महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित मूल महाभारत के पाठों पर आधारित हैं, जिससे इसकी विश्वसनीयता और बौद्धिक गहराई स्वतः सिद्ध होती है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

उत्तर: यह स्थिति अर्जुन के भीतर उत्पन्न अत्यधिक मोह, शोक और नैतिक असमंजस के कारण उत्पन्न हुई। जब उन्होंने अपने ही गुरुओं, परिजनों और मित्रों को युद्धभूमि में अपने विरुद्ध खड़ा देखा, तो उनके भीतर का वात्सल्य और अपनत्व उनके क्षत्रिय धर्म पर हावी हो गया, जिससे मानसिक आघात के कारण शारीरिक प्रतिक्रियाएं (जैसे हाथ-पैर का कांपना, मुंह सूखना) प्रकट हुईं।

उत्तर: यह श्लोक आज के आधुनिक जीवन में भी पूर्णतः प्रासंगिक है। मनुष्य के जीवन में जब भी कोई बड़ा संकट, अस्तित्वगत निर्णय या पारिवारिक-व्यावसायिक मोर्चे पर गहरा तनाव आता है, तब वह इसी प्रकार के मानसिक और शारीरिक विषाद का अनुभव करता है। यह श्लोक ऐसे समय में हमारे अंतर्द्वंद को समझने का उत्तम माध्यम है।

उत्तर: प्रथम अध्याय में अर्जुन का संपूर्ण मोह, कायरता और शोक खुलकर सामने आता है। यद्यपि विषाद एक नकारात्मक अवस्था प्रतीत होती है, किंतु आध्यात्मिक दृष्टि से जब तक व्यक्ति अपने जीवन के भ्रम और विषाद का अनुभव नहीं करता, तब तक उसके भीतर सत्य को जानने की जिज्ञासा (योग) उत्पन्न नहीं होती। इसलिए इस अध्याय का नाम 'अर्जुनविषादयोग' रखा गया है।

उत्तर: हाँ, निश्चित रूप से। जब कोई साधक या पाठक इस श्लोक का अध्ययन करता है, तो उसे यह अहसास होता है कि अर्जुन जैसे महान योद्धा भी जीवन में भ्रमित हुए थे। इससे व्यक्ति अपनी मानवीय कमजोरियों को सहजता से स्वीकार कर पाता है और भगवान श्रीकृष्ण के ज्ञान के माध्यम से मानसिक स्थिरता प्राप्त करता है।

उत्तर: भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के इस कायरतापूर्ण और मोहग्रस्त विषाद को कड़ी फटकार लगाई (जिसे 'क्लैब्यं मा स्म गमः पार्षैत' कहा गया है) और उन्हें आत्मा की अमरता, कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग का उपदेश दिया। भगवान ने समझाया कि शरीर नश्वर है किंतु आत्मा अमर है, अतः अपने कर्तव्य (धर्म) का पालन करना ही मनुष्य का सबसे बड़ा पुरुषार्थ है।

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शारीरिक अभिव्यक्ति / Physical Manifestation

अर्जुन के शरीर ने उनके मानसिक संताप को प्रकट किया – अंग शिथिल, मुख सूखा, कम्पन और रोमांच। Arjuna's body reflected his mental agony – weakened limbs, dry mouth, trembling, and horripilation.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 1: अर्जुन विषाद योग (Arjuna Vishada Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 29 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 29/47 62% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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