मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते | न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ||३०||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
16 पदगाण्डीवम्
गांडीव धनुष
स्रंसते
गिर रहा है
हस्तात्
हाथ से
त्वक्
त्वचा
च
और
एव
ही
परिदह्यते
जल रही है
न
नहीं
च
और
शक्नोमि
समर्थ हूँ
अवस्थातुम्
खड़े रहने में
भ्रमति
भ्रमित हो रहा है
इव
मानो
च
और
मे
मेरा
मनः
मन।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
मेरे हाथ से गांडीव धनुष गिर रहा है, त्वचा जल रही है, मैं स्थिर खड़ा नहीं रह सकता और मेरा मन घूम रहा है (भ्रमित हो रहा है)।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
सनातन संस्कृति के पवित्रतम ग्रंथ श्रीमद्भागवतगीता के प्रथम अध्याय (अर्जुनविषादयोग) का यह तीसवाँ श्लोक (गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते | न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ||३०||) मानव जीवन की अत्यंत संवेदनशील, विचलित और मोहग्रस्त स्थिति का सबसे सजीव और मार्मिक चित्रण प्रस्तुत करता है। यह केवल एक महान योद्धा अर्जुन का युद्धभूमि में उपजा तात्कालिक मानसिक संकट नहीं है, बल्कि यह हर उस प्राणी की कथा है जो मोह, माया, अपने स्वजनों के प्रति अगाध आसक्ति और कर्तव्य-अकर्तव्य के द्वन्द्व में उलझकर अपने मूल लक्ष्य से भटक जाता है।
महाभारत के इस कुरुक्षेत्र महासंग्राम के मुहाने पर खड़े होकर, जब गाण्डीवधारी अर्जुन अपने ही गुरुजनों, भ्रातृजनों और स्नेहीजनों को शत्रु पक्ष में खड़ा देखते हैं, तब उनके भीतर का योद्धा अचानक पंगु हो जाता है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि जब तक मनुष्य अपने भौतिक बंधनों, अज्ञान और मानसिक दुर्बलताओं से घिरा रहता है, तब तक उसके जीवन का सबसे शक्तिशाली साधन (जैसे अर्जुन के लिए उनका दिव्य गाण्डीव धनुष) भी उसके हाथों से छूटने लगता है। इस प्रसंग का सांस्कृतिक और कॉस्मिक महत्व इस बात में निहित है कि यह कुरुक्षेत्र वस्तुतः हमारे भीतर का ही अंतःकरण है, जहाँ धर्म और अधर्म, ज्ञान और अज्ञान, तथा कर्तव्य और मोह के बीच निरंतर युद्ध चल रहा है। जब तक भगवान श्रीकृष्ण रूपी सारथी हमारे जीवन के प्रसंग में मार्गदर्शक नहीं बनते, तब तक अर्जुन की भाँति हमारा मन भी भ्रमित रहेगा और हमारी चेतना की त्वचा भी आंतरिक संताप की अग्नि से जलती रहेगी।
संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि
श्रीमद्भागवतगीता के प्रथम अध्याय 'अर्जुनविषादयोग' का यह श्लोक अत्यंत पवित्र और गहन चिंतन का विषय है। इसका सस्वर पाठ करते समय इसके प्रत्येक शब्द के मर्म को आत्मसात करना चाहिए।
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यतेก
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ॥ ३० ॥
संस्कृत पदच्छेद: गाण्डीवम् स्रंसते हस्तात् त्वक् च एव परिदह्यते । न च शक्नोमि अवस्थातुम् भ्रमति इव च मे मनः ॥
पाठ विधि एवं अनुष्ठानिक नियम:
पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)
श्लोक के प्रत्येक शब्द का शाब्दिक अर्थ और उसका प्रगाढ़ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक विश्लेषण निम्नलिखित सारणी में प्रस्तुत है:
धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)
महाभारत के युद्ध पर्व के अंतर्गत रचित श्रीमद्भागवतगीता सनातन धर्म का वह शिखर ग्रंथ है जो मानव मात्र को जीवन के हर संकट से उबरने का मार्ग दिखाता है। आइए इस प्रसंग की ऐतिहासिक और पौराणिक पृष्ठभूमि को विस्तार से समझें।
कुरुक्षेत्र के मैदान में दोनों सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं। शंखध्वनि हो चुकी थी, रणभेरियाँ बज चुकी थीं। ऐसे समय में पांचजन्य शंख बजाने वाले महाबली अर्जुन ने अपने सारथी भगवान श्रीकृष्ण से कहा कि उनके रथ को दोनों सेनाओं के मध्य ले जाकर खड़ा किया जाए, ताकि वे देख सकें कि युद्ध करने के लिए कौन-कौन से लोग यहाँ उपस्थित हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने उनके इस आग्रह को स्वीकार किया और रथ को भीष्म, द्रोण और अन्य सभी राजाओं के सामने लाकर रोक दिया।
रथ के वहाँ रुकते ही अर्जुन ने देखा कि सामने खड़े लोगों में उनके अपने दादा भीष्म पितामह, उनके गुरु द्रोणाचार्य, उनके भाई, चचेरे भाई, ममेरे भाई, साले, ससुर और मित्र सभी खड़े हैं। इस अदृश्य और विदारक सत्य का सामना करते ही अर्जुन के भीतर वर्षों से संचित पारिवारिक मोह, अहंता और ममत्व की भावना अचानक बाढ़ की तरह उमड़ पड़ी। उनके भीतर का महान धनुर्धर, जिसने खांडव वन को जलाया था, जिसने निवातकवचों का संहार किया था, और जिसने शिवजी को भी युद्ध में प्रसन्न किया था, वह क्षण भर में एक साधारण, विलाप करने वाले मनुष्य में परिवर्तित हो गया।
यह प्रसंग व्यास ऋषि की अद्भुत रचनाशैली का परिचायक है, जो यह दर्शाती है कि बाहरी विजय तब तक अर्थहीन है जब तक मनुष्य अपने आंतरिक शत्रुओं (मोह, शोक, भय, और अज्ञान) पर विजय प्राप्त नहीं कर लेता। अर्जुन का यह शारीरिक और मानसिक पतन (गाण्डीव का हाथ से छूटना, त्वचा का जलना, और मन का भ्रमित होना) इस बात का प्रतीक है कि जब जीव भगवान की शरण को छोड़कर अपने बल और अहंकार पर गर्व करता है, तब उसका सारा पराक्रम धराशायी हो जाता है। यही वह करुणामयी और विकट क्षण था जिसके गर्भ से 'गीता का अमृत' प्रकट हुआ, क्योंकि यदि अर्जुन विषादग्रस्त न होते, तो श्रीकृष्ण को गीता का यह महान उपदेश देने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती।
नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ
श्रीमद्भागवतगीता के इन श्लोकों के अध्ययन, मनन और स्मरण से जीवन में निम्नलिखित महान आध्यात्मिक और मानसिक लाभ प्राप्त होते हैं:
1. मानसिक विकारों और अवसाद का शमन
यह श्लोक दर्शाता है कि महान व्यक्तियों को भी जीवन में अवसाद घेर सकता है। इसके अध्ययन से व्यक्ति यह समझता है कि तनाव कोई असाधारण बात नहीं है, बल्कि इससे सही मार्गदर्शन (श्रीकृष्ण रूपी विवेक) से बाहर निकला जा सकता है।
2. आंतरिक चेतना और आत्म-अवलोकन
जब कोई साधक अर्जुन की इस मनोदशा का अध्ययन करता है, तो वह अपने भीतर छिपे मोह और अहंकार का निष्पक्ष अवलोकन कर पाता है, जिससे आत्मशुद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है।
3. कर्मयोग की प्रेरणा
विषाद के अंधकार से निकलकर कर्तव्य (स्वधर्म) की ओर बढ़ने की प्रेरणा मिलती है। यह सिखाता है कि कठिन परिस्थितियों में भी अपने उत्तरदायित्व से भागना समाधान नहीं है।
4. निर्णय लेने की क्षमता का विकास
मन का भ्रमित होना (भ्रमतीव च मे मनः) मानसिक अस्थिरता को दर्शाता है। गीता के श्लोकों के नियमित अभ्यास से बुद्धि स्थिर और निर्णय लेने में सक्षम बनती है।
5. भगवान की शरणागति का बोध
यह श्लोक मनुष्य को यह सिखाता है कि जब उसका सारा बल और ज्ञान चुक जाए, तब उसे अहंकार छोड़कर भगवान की पूर्ण शरण में चले जाना चाहिए, जैसा अंततः अर्जुन ने किया।
6. सकारात्मक ऊर्जा का संचार
गीता के वचनों और श्लोकों के सस्वर पाठ से शरीर के चारों ओर एक उच्च कोटि की सकारात्मक ऊर्जा (Aura) का निर्माण होता है, जो नकारात्मक शक्तियों को दूर रखती है।
7. संचित कर्मों और पापों का क्षय
भगवान श्रीकृष्ण के मुख से निकले इस दिव्य ज्ञान के प्रसंग का स्मरण करने मात्र से मनुष्य के मानसिक पाप, ईर्ष्या और द्वेष की ग्रंथियाँ सुलझने लगती हैं।
8. आध्यात्मिक शांति और धैर्य
जीवन के थपेड़ों और दुखों के बीच व्यक्ति को अडिग रहने की मानसिक शक्ति मिलती है। वह समझ जाता है कि सुख और दुख जीवन के चक्र मात्र हैं।
संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)
यह लेख Bhaktilok.in के उच्च कोटि के विद्वान आचार्यों, संस्कृत भाषाविदों और सनातन शास्त्रों के मर्मज्ञों द्वारा संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के अंतर्गत प्रस्तुत किया गया है। श्रीमद्भागवतगीता के इस श्लोक की व्याख्या महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित मूल महाभारत, आदि शंकराचार्य जी के गीता भाष्य, तथा स्वामी रामसुखदास जी एवं अन्य प्रामाणिक आचार्यों के टीका ग्रंथों के आधार पर की गई है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक वेदों, पुराणों और उपनिषदों का विशुद्ध, मिलावट-रहित और दार्शनिक दृष्टि से परिपूर्ण ज्ञान पहुँचाना है, ताकि आधुनिक जीवन की भागदौड़ में भी सनातन संस्कृति के मूल्य जीवंत बने रहें।
अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)
असमर्थता / Incapacity
अर्जुन युद्ध करने की अपनी क्षमता पर से विश्वास खो बैठे हैं – वे धनुष भी नहीं थाम सकते। Arjuna loses confidence in his ability to fight – he cannot even hold his bow.