श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 1 (अर्जुन विषाद योग (Arjuna Vishada Yoga))

अध्याय 1 · श्लोक 31

अर्जुन विषाद योग (Arjuna Vishada Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 47 37 मिनट का पठन 122 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव | न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ||३१||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
निमित्तानि
लक्षण
च
और
पश्यामि
देखता हूँ
विपरीतानि
विपरीत
केशव
हे केशव (कृष्ण)
न
नहीं
च
और
श्रेयः
कल्याण
अनुपश्यामि
देखता हूँ
हत्वा
मारकर
स्वजनम्
स्वजनों को
आहवे
युद्ध में।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे केशव! मैं विपरीत (अशुभ) लक्षण देख रहा हूँ और युद्ध में अपने स्वजनों को मारकर मुझे कल्याण नहीं दिखता।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

सनातन धर्म, वेद, पुराण और विशेष रूप से श्रीमद्भगवद्गीता (Shrimad Bhagavad Gita) मानव जीवन के समस्त संशयों, विकारों, मोह और धर्म-अधर्म के समर का एकमात्र शाश्वत समाधान प्रस्तुत करती है। गीता के प्रथम अध्याय (अर्जुनविषादयोग) का 31वां श्लोक—"निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव..."—न केवल महाभारत के उस भीषण युद्ध के मुहाने पर खड़े एक महायोद्धा की मानसिक और भावनात्मक स्थिति का द्योतक है, बल्कि यह हर उस मनुष्य की वेदना का प्रतीक है जो जीवन के किसी न किसी पड़ाव पर कर्तव्य और मोह के बीच धर्मसंकट में फँस जाता है। Bhaktilok.in के इस पावन मंच पर हम इस परम पवित्र श्लोक के माध्यम से अर्जुन के आंतरिक अवसाद, अशुभ शकुनों के दार्शनिक संकेत, और भगवान श्रीकृष्ण के सान्निध्य में जागृत होने वाले उस वैराग्य की गहराई में उतरेंगे, जो अंततः मोक्ष और कर्मयोग के मार्ग को प्रशस्त करता है।

जब कुरुक्षेत्र के मैदान में दोनों सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं, और शंखनाद के साथ रणभेरी बज चुकी थी, तब कौरव सेना की आक्रामकता और अन्याय के विरुद्ध पांडव पक्ष अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए तत्पर था। ऐसे समय में, जब पांचजन्य और देवदत्त शंखों की गूंज से दिशाएं सुदूर तक कंपायमान थीं, अर्जुन का रथ युद्धभूमि के मध्य में आकर रुकता है। कौरवों के पक्ष में अपने ही गुरुजनों, पितामहों, भाइयों, पुत्रों और मित्रों को देखकर अर्जुन का गाण्डीव धनुष हाथ से सरकने लगता है। उनके भीतर का क्षत्रिय धर्म सहसा पारिवारिक मोह और करुणा से आच्छादित हो जाता है। यही वह क्षण है जब अर्जुन प्रकृति के नियमों, शकुनों और अपने आंतरिक भावों का विश्लेषण करते हुए केशव (श्रीकृष्ण) से कहते हैं कि हे कृष्ण! मुझे चारों ओर केवल विपरीत और अशुभ निमित्त ही दिखाई दे रहे हैं।

इस श्लोक का सांस्कृतिक और ब्रह्मांडीय महत्व अत्यंत व्यापक है। यह हमें यह सिखाता है कि युद्ध केवल बाहर नहीं लड़ा जाता, बल्कि सबसे भयंकर युद्ध मनुष्य के अपने मन के भीतर चल रहा होता है — मोह और विवेक के बीच, राग और त्याग के बीच, स्वजन प्रेम और सार्वभौमिक कर्तव्य (धर्म) के बीच। जब मनुष्य का चित्त अज्ञान और मोह से ग्रस्त होता है, तो उसे बाह्य प्रकृति में भी अशुभ और डरावने संकेत दिखने लगते हैं। यह आलेख इसी दिव्य श्लोक के शाब्दिक, दार्शनिक, पौराणिक और व्यावहारिक पक्षों को पूरी दिव्यता और प्रामाणिकता के साथ आपके समक्ष प्रस्तुत करता है, ताकि आप अपने जीवन के हर कुरुक्षेत्र में सही निर्णय ले सकें।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

— श्रीमद्भगवद्गीता | प्रथम अध्याय (अर्जुनविषादयोग) | श्लोक ३१ —

निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव।
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे॥ ३१॥


"हे केशव! मैं सभी प्रकार के अशुभ शकुन देख रहा हूँ। युद्ध में अपने ही स्वजनों को मारकर मुझे कोई कल्याण (श्रेय) दिखाई नहीं देता।"

पाठ विधि एवं ध्यान: इस श्लोक का उच्चारण करने से पूर्व मन को शांत करें, भगवान श्रीकृष्ण के पावन स्वरूप का ध्यान करें और गहरी श्वास लें। यह श्लोक मनुष्य को जीवन के किसी भी कठिन निर्णय से पहले अंतर्मुखी होने की प्रेरणा देता है। इसका पाठ संध्यावंदन या गीता पाठ के दौरान पूर्ण श्रद्धा के साथ करना चाहिए।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

आइए इस महान श्लोक के प्रत्येक पद की गहराई में प्रवेश करें और इसके गूढ़ दार्शनिक अर्थ को समझें:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
निमित्तानि अशुभ लक्षण, शकुन या निमित्त प्रकृति द्वारा दिए जाने वाले संकेत जो आसन्न संकट या परिणामों की सूचना देते हैं।
च और, तथा अर्जुन की चेतना में लगातार उमड़ते हुए विचारों और बाहरी परिस्थितियों का समुच्चय।
पश्यामि मैं देखता हूँ अर्जुन की अंतर्दृष्टि और बाह्य नेत्रों द्वारा देखी जा रही भयभीत करने वाली परिस्थितियां।
विपरीतानि विपरीत, प्रतिकूल या अशुभ सामान्य नियमों के विपरीत होने वाली घटनाएं, जो विनाश का संकेत देती हैं।
केशव हे केशव! (श्रीकृष्ण का नाम) केशी नामक दैत्य का वध करने वाले तथा ब्रह्मा, विष्णु और शिव को अपने भीतर समाहित करने वाले परमेश्वर को संबोधन।
न नहीं अस्वीकार का सूचक, जहाँ अर्जुन किसी भी प्रकार के अच्छे परिणाम की संभावना को नकारते हैं।
च और (भी) तर्कों की श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुए अर्जुन का अपनी बात पर दृढ़ रहना।
श्रेयः कल्याण, भलाई, मोक्ष या उत्तम मार्ग आत्मा का उत्थान या परम शांति प्राप्त करने का मार्ग, जो यहाँ धुंधला पड़ रहा है।
अनुपश्यामि मैं देखता हूँ (या पा रहा हूँ) बुद्धि की वह अवस्था जहाँ विवेक भ्रमित होने के कारण कोई सकारात्मक मार्ग नहीं सूझ रहा।
हत्वा मारकर, वध करके अपने ही रक्त संबंधियों, गुरुओं और प्रियजनों के प्राणों का अंत करने का पाप।
स्वजनम् अपने स्वजन, परिवारजन, संबंधी वंश, कुल, समाज और रक्त संबंधियों के प्रति स्वाभाविक मोह और अपनापन।
आहवे युद्ध में, संग्राम भूमि में कुरुक्षेत्र का वह पावन मैदान जहाँ धर्म और अधर्म का निर्णय होना था।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत आती है। महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत महाकाव्य केवल एक युद्ध की गाथा नहीं है, बल्कि यह मानव जीवन के संपूर्ण मनोविज्ञान, राजनीति, नीतिशास्त्र और आध्यात्मिकता का विश्वकोश है। जब कौरवों और पांडवों के बीच तमाम शांति प्रयासों (जैसे भगवान श्रीकृष्ण की दूत बनकर हस्तिनापुर यात्रा और विदुर-नीति) के बावजूद दुर्योधन ने सुई की नोक बराबर भी भूमि देने से इंकार कर दिया, तब युद्ध अनिवार्य हो गया।

कुरुक्षेत्र के मैदान में दोनों ओर की सेनाएं सज चुकी थीं। महर्षि वेद व्यास ने धृतराष्ट्र को संजय के माध्यम से दिव्य दृष्टि प्रदान की थी, जिससे वे महल में बैठे-बैठे ही युद्ध का आंखों देखा हाल सुन रहे थे। युद्ध के ठीक आरंभ में, अर्जुन ने अपने सारथी भगवान श्रीकृष्ण से अपने रथ को दोनों सेनाओं के मध्य में ले चलने का अनुरोध किया। जब रथ भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, दुर्योधन और कर्ण जैसे महारथियों के सामने रुका, तो अर्जुन ने देखा कि वहां उनके अपने ही दादा, गुरु, मामा, भाई और भतीजे खड़े हैं।

इस ऐतिहासिक और पौराणिक संदर्भ में, अर्जुन का मोहग्रस्त होना कोई साधारण कायरता नहीं थी, बल्कि यह मानव जाति के उस मूल स्वभाव का प्रकटन था जो अपनों के विनाश से डरता है। प्राचीन वेदों और पुराणों में शकुन-अपशकुन (निमित्त) का बड़ा महत्व माना गया है। जब समाज या कुल का विनाश होने वाला होता है, तो प्रकृति भी अपने नियमों में उलटफेर दर्शाती है — जैसे आंधी-तूफान, पक्षियों का अशुभ बोलना, और मन में भारी आशंका का पैदा होना। अर्जुन वही सब महसूस कर रहे थे। वे महर्षि वेद व्यास और अन्य ऋषियों से सीखे गए धर्म के सिद्धांतों और पारिवारिक प्रेम के बीच बुरी तरह उलझ गए थे। यही वह पृष्ठभूमि है जो भगवान श्रीकृष्ण को भगवद्गीता के रूप में दिव्य ज्ञान का उपदेश देने के लिए प्रेरित करती है, जिसकी शुरुआत इसी विषाद से होती है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक और इसके मर्म को समझने व पाठ करने से साधक को निम्नलिखित अपूर्व मानसिक और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. मानसिक द्वंद्व और भ्रम से मुक्ति

जब जीवन में निर्णय लेना कठिन हो जाए, तो अर्जुन के इस प्रसंग का मनन करने से मन का कल्पित भय दूर होता है और स्पष्टता आती है।

2. आंतरिक संवेदनशीलता और करुणा का संतुलन

यह श्लोक सिखाता है कि कठोर से कठोर परिस्थिति में भी मनुष्य के भीतर दूसरों के प्रति करुणा और मानवीय संवेदना जीवित रहनी चाहिए।

3. सकारात्मक ऊर्जा और औरा (Aura) का विकास

गीता के श्लोकों का नियमित उच्चारण और पाठ करने से शरीर के चारों ओर एक उच्च आध्यात्मिक और सकारात्मक ऊर्जा का सुरक्षा कवच बनता है।

4. कर्म और कर्तव्य के प्रति जागृति

मोह जनित पलायनवाद से मुक्ति मिलती है और व्यक्ति अपने वास्तविक धर्म तथा सामाजिक-पारिवारिक दायित्वों को सही परिप्रेक्ष्य में समझ पाता है।

5. तनाव और अवसाद (Depression) का शमन

आधुनिक मनोविज्ञान और प्राचीन वेदों के समन्वय से यह श्लोक अत्यधिक मानसिक तनाव, चिंता और डिप्रेशन से जूझ रहे व्यक्तियों को मानसिक शांति प्रदान करता है।

6. भगवान श्रीकृष्ण की शरण प्राप्ति

श्लोक में 'केशव' संबोधन भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव जगाता है, जिससे साधक को ईश्वरीय कृपा और शरण की अनुभूति होती है।

7. आत्मनिरीक्षण (Self-Introspection) की क्षमता

मनुष्य अपनी कमजोरियों और पूर्वाग्रहों का गहराई से निरीक्षण करना सीखता है, जिससे अहंकार का शमन होता है।

8. कार्मिक शुद्धि (Karmic Purification)

सत्य और धर्म के मार्ग पर निष्काम भाव से अग्रसर होने की प्रेरणा मिलने से पिछले कर्मों के नकारात्मक प्रभावों का क्षय होने लगता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in पर प्रस्तुत यह आलेख वेदों, पुराणों, महाभारत के मूल संस्कृत ग्रंथों और आदि शंकराचार्य, स्वामी रामानुजाचार्य तथा स्वामी गीतानंद जैसे महान आचार्यों के गीता भाष्यों के गहन अध्ययन और विश्लेषण के उपरांत तैयार किया गया है। हमारा उद्देश्य सनातन संस्कृति के मूल संदेश को बिना किसी मिलावट या अतिशयोक्ति के, पूरी सटीकता और सुलभ हिंदी भाषा में पाठकों तक पहुंचाना है।

संदर्भ ग्रंथ: श्रीमद्भगवद्गीता (गीता प्रेस गोरखपुर संस्करण), महाभारत (भीष्म पर्व), और प्राचीन वैदिक शकुन शास्त्र। सभी पाठकों से अनुरोध है कि वे इस पावन ज्ञान को केवल बौद्धिक स्तर पर न समझें, बल्कि अपने दैनिक जीवन के आचरण में उतारकर अपने जीवन को धन्य बनाएं।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के प्रथम अध्याय 'अर्जुनविषादयोग' का 31वां श्लोक है। इस प्रसंग में कुरुक्षेत्र के युद्ध से ठीक पहले अर्जुन कौरव सेना में अपने गुरुओं, संबंधियों और प्रियजनों को देखकर अत्यधिक मोह और मानसिक अवसाद से घिर जाते हैं और भगवान श्रीकृष्ण से अपने मन की पीड़ा व्यक्त करते हैं।

दार्शनिक रूप से, जब मनुष्य का चित्त मोह, अज्ञान और भय से ग्रस्त हो जाता है, तो उसे बाह्य प्रकृति और भविष्य में केवल विनाश ही दिखाई देता है। अर्जुन का अशुभ निमित्त देखना उनके आंतरिक मानसिक क्षोभ और पारिवारिक विनाश के प्रति गहरी चिंता का बाह्य प्रकटन था, जो धर्म और कर्तव्य के बीच उनके असमंजस को दर्शाता है।

बिल्कुल नहीं। अर्जुन का यह विषाद कायरता नहीं, बल्कि एक संवेदनशील मानव का अपने स्वजनों के प्रति अपार प्रेम और करुणा का परिणाम था। हालांकि, भगवान श्रीकृष्ण ने बाद के अध्यायों में इसे 'क्लैब्यम्' (नपुंसकता या मानसिक दुर्बलता) कहकर इसे पार करने और अपने क्षत्रिय धर्म (कर्तव्य) का पालन करने का उपदेश दिया।

आधुनिक जीवन में जब भी व्यक्ति अपने करियर, पारिवारिक रिश्तों या नैतिक दायित्वों के बीच किसी बड़े संकट या चौराहे पर खुद को पाता है, तो यह श्लोक सिखाता है कि अपने संशयों को दबाएं नहीं, बल्कि उनका सामना करें और योग्य गुरु या उच्च चेतना (कृष्ण) से मार्गदर्शन प्राप्त करें।

जब हम इस श्लोक का पाठ करते हैं और इसके मर्म को समझते हैं, तो हमें यह अहसास होता है कि जीवन के संघर्ष सार्वभौमिक हैं। भगवान श्रीकृष्ण के नाम 'केशव' के स्मरण से मन में स्थिरता आती है, और आंतरिक भय धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है, जिससे मानसिक शांति और आत्मबल में वृद्धि होती है।

आशंका / Apprehension

अर्जुन को लगता है कि यह युद्ध केवल विनाश लाएगा, कल्याण नहीं। Arjuna feels that this war will only bring destruction, not welfare.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 1: अर्जुन विषाद योग (Arjuna Vishada Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 31 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 31/47 66% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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