मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च | किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा ||३२||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
17 पदन
नहीं
काङ्क्षे
चाहता हूँ
विजयम्
विजय
कृष्ण
हे कृष्ण
न
नहीं
च
और
राज्यम्
राज्य
सुखानि
सुख
च
और
किम्
क्या
न
हमें
राज्येन
राज्य से
गोविन्द
हे गोविन्द
किम्
क्या
भोगैः
भोगों से
जीवितेन
जीवन से
वा
अथवा।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे कृष्ण! मैं विजय नहीं चाहता, न राज्य और न सुख। हे गोविन्द! हमें राज्य से क्या प्रयोजन? भोगों से या जीवन से भी क्या?
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भूमिका: कुरुक्षेत्र के प्रांगण में उत्पन्न आत्यंतिक वैराग्य और मोह का द्वंद्व
सनातन संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना के सर्वोच्च ग्रंथ श्रीमद्भगवद्गीता के प्रथम अध्याय (अर्जुनविषादयोग) का यह पैंतीसवां (अथवा मानक क्रम के अनुसार बत्तीसवां) श्लोक मनुष्य के अंतःकरण में उठने वाले उन मूलभूत नैतिक, दार्शनिक और मानवीय प्रश्नों का प्रतीक है, जो जीवन के किसी न किसी मोड़ पर हर विचारशील व्यक्ति को झकझोर देते हैं। जब महाभारत के महान रणक्षेत्र में कुरुक्षेत्र की भूमि पर दोनों सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं, तब गांडीवधारी अर्जुन के मन में विजय, राज्य और ऐश्वर्य की लालसा क्षीण हो गई और उनके स्थान पर स्वजनों के प्रति करुणा, मोह और महान विनाश की आशंका ने जन्म ले लिया।
यह श्लोक केवल दो पक्षों के बीच युद्ध का वर्णन मात्र नहीं है, अपितु यह आत्मा और परमात्मा, कर्तव्य और मोह, तथा भौतिक सुखों और आध्यात्मिक शांति के बीच चलने वाले सनातन आंतरिक संघर्ष का सजीव चित्रण है। जब मनुष्य अपने ही प्रियजनों को सांसारिक स्वार्थों की बलि चढ़ते देखता है या उनके विनाश का कारण बनता है, तब उसकी चेतना किस प्रकार हतप्रभ हो जाती है, इसका अत्यंत सजीव और मर्मस्पर्शी वर्णन इस श्लोक में मिलता है। Bhaktilok.in के इस विशेष अध्ययन में हम इसी गूढ़ श्लोक के शाब्दिक अर्थ, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, दार्शनिक गहराई और आधुनिक जीवन में इसके प्रासंगिक उपयोग का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं, ताकि साधक केवल शब्दों को न समझें, बल्कि इसके मर्म को अपने जीवन में उतार सकें।
संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि
न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च |
किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा ||३२||
(na kāṅkhe vijayaṃ kṛṣṇa na ca rājyaṃ sukhāni ca |
kiṃ no rājyena govinda kiṃ bhogairjīvitena vā ||32||)
श्लोक पाठ की शास्त्रीय विधि एवं ध्यान मुद्रा:
इस श्लोक का उच्चारण करते समय साधक को एकाग्र चित्त होकर भगवान श्रीकृष्ण के स्वरूप का स्मरण करना चाहिए। यह श्लोक वैराग्य और आत्म-निरीक्षण का प्रतीक है। इसका पाठ प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त में अथवा संध्या बेला में शांत मन से करना चाहिए। पाठ से पूर्व आचमन कर अपने इष्टदेव का ध्यान करें और मन में यह भाव रखें कि भौतिक उपलब्धियां और ऐश्वर्य आत्मिक शांति के आगे अत्यंत तुच्छ हैं। निष्काम भाव और धर्म की स्थापना ही जीवन का परम लक्ष्य होना चाहिए।
पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)
आइए इस पवित्र श्लोक के प्रत्येक शब्द की गहराई में उतरें और इसके शाब्दिक तथा दार्शनिक अर्थ को समझें:
धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)
महाभारत के महाकाव्य काल में जब पांडवों और कौरवों के बीच संधि के तमाम प्रयास विफल हो गए, तब युद्ध अनिवार्य हो गया। हस्तिनापुर के सिंहासन को लेकर हुआ यह विवाद केवल दो भाइयों या परिवारों का संघर्ष नहीं था, बल्कि यह धर्म और अधर्म, न्याय और अन्याय के बीच का एक विराट महासंग्राम था। युद्ध के ठीक पूर्व, जब दोनों सेनाएं हस्तिनापुर के मैदान में उतरीं, तब पांडव सेना के प्रमुख नायक अर्जुन ने अपने सारथि भगवान श्रीकृष्ण से अपने रथ को दोनों सेनाओं के मध्य में ले चलने का आग्रह किया।
रथ के मध्य में पहुँचते ही अर्जुन की दृष्टि अपने गुरुओं (द्रोणाचार्य, कृपाचार्य), पितामह (भीष्म), भाइयों, चचेरे भाइयों, मित्रों और सगे-सम्बन्धियों पर पड़ी। उन्होंने देखा कि युद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद भी उन्हें जिन लोगों के साथ मिलकर इस राज्य का आनंद लेना था, वे सभी मृत्यु के मुख में समाने के लिए तैयार खड़े हैं। इस दृश्य ने अर्जुन के भीतर एक भयंकर मानसिक उथल-पुथल पैदा कर दी। उनके हाथ से गांडीव धनुष फिसलने लगा, उनका शरीर कांपने लगा और उनका मन पूरी तरह से विषाद से भर गया।
इसी ऐतिहासिक और दार्शनिक पृष्ठभूमि में अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण के समक्ष यह ऐतिहासिक घोषणा की कि उन्हें ऐसा कोई भी राज्य, विजय या सुख नहीं चाहिए जिसके बदले में उनके अपने प्रियजनों का संहार हो। महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत और श्रीमद्भगवद्गीता के इस प्रसंग का उद्देश्य मनुष्य को यह सिखाना है कि जब जीवन में कर्तव्य और मोह का टकराव हो, तब विवेक और धर्म का मार्ग चुनना ही श्रेष्ठ है। यह प्रसंग हमें यह भी बताता है कि महान से महान योद्धा और ज्ञानी व्यक्ति भी मोह के क्षणों में विचलित हो सकता है, और ऐसे समय में भगवद्कृपा तथा आत्मज्ञान ही उसका एकमात्र उद्धार कर सकते हैं।
नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)
इस पवित्र श्लोक का नियमित चिंतन, पाठ और इसके मर्म को आत्मसात करने से साधक को निम्नलिखित अलौकिक और व्यावहारिक लाभ प्राप्त होते हैं:
संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in पर प्रकाशित यह लेख महर्षि वेदव्यास विरचित श्रीमद्भगवद्गीता के प्रथम अध्याय (अर्जुनविषादयोग) के मूल प्रामाणिक श्लोकों, पारंपरिक टीकाओं (जैसे आदि शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदास और स्वामी ज्ञानानन्द जी महाराज के भाष्यों) तथा आधुनिक मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक दृष्टिकोण के गहन अध्ययन पर आधारित है। हमारे विद्वान संपादकों और संस्कृत भाषाविदों ने यह सुनिश्चित किया है कि पाठकों तक सनातन धर्म का शुद्ध, मिलावट-रहित और तार्किक ज्ञान पहुंचे। इस सामग्री का उद्देश्य किसी भी प्रकार की भ्रामक मान्यताओं को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि पाठकों को वेदों, उपनिषदों और महाकाव्यों के शाश्वत ज्ञान से जोड़ना है।
अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)
मोह का प्रभाव / Effect of Attachment
अर्जुन के मोह ने उन्हें इस स्थिति में ला दिया है कि वे जीवन के सभी लक्ष्यों को त्यागने को तैयार हैं। Arjuna's attachment has brought him to a point where he is ready to renounce all goals of life.