श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 1 (अर्जुन विषाद योग (Arjuna Vishada Yoga))

अध्याय 1 · श्लोक 33

अर्जुन विषाद योग (Arjuna Vishada Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 47 42 मिनट का पठन 114 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च | त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ||३३||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

16 पद
येषाम्
जिनके लिए
अर्थे
लिए
काङ्क्षितम्
इच्छित
नः
हमारे द्वारा
राज्यम्
राज्य
भोगाः
भोग
सुखानि
सुख
च
और
ते
वे
इमे
ये
अवस्थिताः
खड़े हैं
युद्धे
युद्ध में
प्राणान्
प्राण
त्यक्त्वा
त्यागकर
धनानि
धन
च
और।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जिनके लिए हम राज्य, भोग और सुख चाहते थे, वे ही लोग यहाँ प्राण और धन त्यागकर युद्ध में खड़े हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

"येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च | त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ||३३||"

प्रस्तावना: मोह, ममता और मानवीय संवेदनाओं का पराकाष्ठा स्थल

भारतीय सनातन संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना के सर्वोच्च शिखर, श्रीमद्भगवद्गीता के प्रथम अध्याय (अर्जुनविषादयोग) का यह पैंतीसवाँ (मूल गणना के अनुसार तैंतीसवाँ) श्लोक केवल दो पक्षों के बीच युद्ध का वर्णन नहीं है, अपितु यह मानव मात्र के अंतःकरण में उठने वाले उस गंतव्यहीन मोह, पारिवारिक आसक्ति और कर्तव्यविमूढ़ता का जीवंत दस्तावेज है, जो हर युग में मनुष्य को उसके धर्म पथ पर भ्रमित करता आया है। भक्तालोक (Bhaktilok.in) के इस विशेष शोध-पत्र में हम महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत के इस अत्यंत संवेदनशील प्रसंग का भाषावैज्ञानिक, दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं।

जब हम महाभारत के इस कुरुक्षेत्र के प्रांगण में अर्जुन की मनःस्थिति का अध्ययन करते हैं, तो पाते हैं कि अर्जुन कोई साधारण योद्धा नहीं थे, बल्कि वे नारायणास्त्र-भेदी, दिव्यास्त्रों के ज्ञाता और भगवान श्रीकृष्ण के अनन्य सखा थे। किंतु जब बात अपने ही गुरुओं (द्रोणाचार्य, कृपाचार्य), पितामह (भीष्म), भाइयों (दुर्योधन आदि) और स्नेहीजनों के संहार की आती है, तो उनका शौर्य करुणा में बदल जाता है। यह श्लोक उसी महा-परिवर्तन और आंतरिक उथल-पुथल की पराकाष्ठा है, जहाँ एक विजेता के रूप में नहीं, बल्कि एक हताश और विचलित स्नेहीजन के रूप में अर्जुन अपने आराध्य श्रीकृष्ण के समक्ष अपने अस्त्र-शस्त्र त्याग देते हैं।

सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से, यह श्लोक हमें सिखाता है कि किस प्रकार भौतिक सुख-भोग और पारिवारिक आकांक्षाएं मनुष्य की विवेक बुद्धि को आच्छादित कर लेती हैं। अर्जुन जिन लोगों के लिए ऐश्वर्य, सिंहासन और विजय की कामना कर रहे थे, आज नियति ने उन्हीं को उनके प्राणों और धन की आहुति देने के लिए आमने-सामने खड़ा कर दिया है। यह द्वंद्व केवल दो सेनाओं का नहीं, बल्कि 'स्वार्थ एवं मोह' तथा 'परम कर्तव्य एवं धर्म' के बीच का शाश्वत संघर्ष है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

सस्वर पाठ एवं उच्चारण विधि: इस श्लोक का उच्चारण करते समय अनुस्वारांत शब्दों पर विशेष ध्यान देना चाहिए तथा प्रत्येक चरण के अंत में यति (विराम) रखनी चाहिए।

॥ अथ श्रीमद्भगवद्गीता प्रथमोऽध्यायः (अर्जुनविषादयोगः) ॥

येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च ।
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ॥ ३३ ॥

संस्कृत पदच्छेद:

येषाम् अर्थे काङ्क्षितं नः राज्यं भोगाः सुखानि च ।
ते इमे अवस्थिताः युद्धे प्राणां त्यक्त्वा धनानि च ॥

श्लोक का अन्वय:

येषाम् अर्थे नः राज्यं भोगाः सुखानि च काङ्क्षितं, ते इमे प्राणां धनानि च त्यक्त्वा युद्धे अवस्थिताः।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

श्रीमद्भगवद्गीता के प्रत्येक शब्द में वेदतुल्य गहराई समाहित है। इस श्लोक के एक-एक पद का व्याकरणिक और दार्शनिक विश्लेषण नीचे दी गई सारणी में प्रस्तुत है, जो साधकों को इसके गूढ़तम रहस्यों को समझने में सहायता करेगा:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
येषाम् (Yesham) जिनके लिए यह पद अर्जुन की उन व्यक्तियों के प्रति अगाध आत्मीयता को दर्शाता है जिन्हें वे अपना सर्वस्व मानते थे।
अर्थे (Arthe) लिए / निमित्त जीवन के समस्त प्रयोजनों और उद्देश्यों का केंद्रबिंदु जब अपने स्वजन बन जाते हैं, तब मोह की उत्पत्ति होती है।
काङ्क्षितम् (Kankshitam) इच्छा की गई थी भौतिक सुखों और भविष्य की योजनाओं की वह कामना जो मनुष्य अपने प्रियजनों की प्रसन्नता के लिए बुनता है।
नः (Nah) हमारे द्वारा / हमारे लिए यहाँ 'नः' बहुवचन का प्रयोग अर्जुन के सामूहिक पारिवारिक दृष्टिकोण को उजागर करता है।
राज्यम् (Rajyam) राज्य / सिंहासन राजनीतिक सत्ता और अधिकार, जिसे प्राप्त करने के लिए व्यक्ति नैतिकता की सीमाओं को भी लांघने को तैयार हो जाता है।
भोगाः सुखानि च (Bhogah Sukhani Cha) भोग और विभिन्न प्रकार के सुख इन्द्रियजन्य सुख-सुविधाएं, जिन्हें मनुष्य जीवन का अंतिम लक्ष्य मान बैठता है, परंतु जो अंततः बंधनकारी हैं।
ते इमे (Te Ime) वे ये सभी प्रत्यक्ष रूप से सामने खड़े हुए वे ही आदरणीय जन, जिन्हें देखकर अर्जुन का हृदय कांप उठा है।
अवस्थिताः युद्धे (Avasthitah Yudhe) युद्ध में उपस्थित हैं धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र की वह कठोर वास्तविकता, जहाँ प्रेम और घृणा दोनों युद्धभूमि में आमने-सामने आ चुके हैं।
प्राणान् त्यक्त्वा (Pranan Tyaktva) अपने प्राणों को त्यागने के लिए तत्पर जीवन के सबसेमूल्यवान प्राणों की आहुति देने को उद्यत वीर योद्धा, जो मृत्यु से भयभीत नहीं हैं।
धनानि च (Dhanani Cha) तथा अपने धन-दौलत और वैभव को भौतिक संपदा और अर्थ का मोह त्यागकर केवल अपने पक्ष या अपने अहंकार की रक्षा के लिए युद्धरत परिजन।

व्यापक दार्शनिक विश्लेषण:

इस श्लोक में अर्जुन का विलाप केवल भौतिक नुकसान पर नहीं है, बल्कि उस विडंबना पर है जहाँ जिस परिवार और समाज के पोषण के लिए मनुष्य जीवन भर धन कमाता है और राज्य की कामना करता है, वही परिवार और राज्य युद्ध की वेदी पर होम होने के लिए तैयार बैठे हैं। यह प्रसंग मनुष्य को यह सोचने पर विवश करता है कि क्या ऐसे राज्य और सुख का कोई मूल्य है जिसे अपनों की लाशों पर खड़ा किया गया हो? यहीं से भगवान श्रीकृष्ण श्रीमद्भगवद्गीता के अमर ज्ञान का बीजारोपण करते हैं।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

महाभारत का कुरुक्षेत्र प्रसंग और अर्जुन का विषाद

श्रीमद्भगवद्गीता महाभारत के भीष्म पर्व (अध्याय 25 से 42) का अंश है। कौरवों और पांडवों के बीच जब जुए की चाल से लेकर अज्ञातवास और लाक्षागृह तक के अनगिनत अत्याचारों को पार करने के बाद भी शांति के सभी प्रयास विफल हो गए, तब अंततः धर्म और अधर्म का यह महासंग्राम कुरुक्षेत्र की पवित्र भूमि पर अनिच्छा से ही सही, आरंभ होना ही था। दोनों सेनाएं शंखध्वनि, दुंदुभि और नगाड़ों के साथ आमने-सामने खड़ी थीं। कौरव सेना का नेतृत्व भीष्म पितामह कर रहे थे, जबकि पांडव सेना का संचालन धौम्य, युधिष्ठिर और स्वयं अर्जुन के पराक्रम पर आधारित था।

युद्ध के ठीक पूर्व, जब अर्जुन ने अपने सारथी भगवान श्रीकृष्ण से अपने रथ को दोनों सेनाओं के बीच (भीष्म और द्रोण के ठीक सामने) खड़ा करने का आग्रह किया, तो रथ के रुकते ही अर्जुन की दृष्टि उन तमाम लोगों पर पड़ी जो उनके अपने थे। उन्होंने देखा कि वहाँ कोई पराया नहीं है; दादा भीष्म, गुरु द्रोण, कृपाचार्य, मामा शल्य, साले, भतीजे, मित्र (जैसे दुर्योधन आदि भाई) और उनके अपने ही गुरुजन खड़े हैं जो उनके बाल-सखा और शुभचिंतक हुआ करते थे।

महर्षि वेद व्यास ने इस प्रसंग का अत्यंत मार्मिक चित्रण किया है। अर्जुन के भीतर का योद्धा अचानक एक संवेदनशील पारिवारिक पुरुष में बदल गया। उन्होंने सोचा कि जिस राज्य, ऐश्वर्य, भोग-विलासिता और विजय के लिए वे अपने गुरुओं और भाइयों का वध करने जा रहे हैं, यदि वे लोग ही जीवित नहीं बचेंगे, तो उस राज्य का भोग कौन करेगा? वे किसके साथ अपनी विजय का उत्सव मनाएंगे? यह प्रश्न केवल अर्जुन का प्रश्न नहीं था, बल्कि यह उस संपूर्ण मानवीय संवेदना का प्रतिनिधित्व करता है जो हिंसा के भयानक परिणाम को देखकर कांप उठती है।

यही कारण है कि भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के इस मोह को दूर करने के लिए उन्हें सांख्य योग, कर्म योग, भक्ति योग और ज्ञान योग का वह विराट संदेश दिया जो आज संपूर्ण मानवता के लिए मार्गदर्शक प्रकाश स्तंभ बना हुआ है। यदि अर्जुन के मन में यह विषाद उत्पन्न न होता, तो गीता रूपी अमृत का यह प्राकट्य इस पृथ्वी पर कभी संभव नहीं हो पाता।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

श्रीमद्भगवद्गीता के इन श्लोकों का स्वाध्याय, मनन और पठन करने से साधक के जीवन में अभूतपूर्व मानसिक शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होता है। भक्तालोक (Bhaktilok.in) के विद्वानों द्वारा अनुशंसित इसके प्रमुख आध्यात्मिक लाभ निम्नलिखित हैं:

1. मोह और आसक्ति से मुक्ति

श्लोक के गहन चिंतन से व्यक्ति को संसार के भौतिक पदार्थों और रिश्तों के प्रति अति-आसक्ति से उबरने में मानसिक संबल मिलता है।

2. मानसिक तनाव एवं अवसाद का शमन

अर्जुन के विषाद को पढ़कर जब व्यक्ति अपने दुखों की तुलना करता है, तो उसका आंतरिक तनाव और अवसाद स्वतः ही कम होने लगता है।

3. कर्तव्यबोध और धर्मनिष्ठा में वृद्धि

यह श्लोक सिखाता है कि कठिन परिस्थितियों में भी अपने व्यक्तिगत मोह से ऊपर उठकर अपने धर्म और कर्तव्य का पालन कैसे किया जाए।

4. सकारात्मक ऊर्जा औरा (Aura) का विकास

गीता के श्लोकों का नियमित सस्वर पाठ करने से शरीर के चारों ओर एक उच्च कोटि की सकारात्मक ऊर्जा और आध्यात्मिक सुरक्षा कवच बनता है।

5. कर्मफल के प्रति अनासक्ति योग

साधक को यह समझ विकसित होती है कि केवल भोग और सुख के पीछे भागना जीवन का वास्तविक उद्देश्य नहीं है, बल्कि आत्मा का उत्थान सर्वोपरि है।

6. आत्मनिरीक्षण (Introspection) की क्षमता

यह हमें अपने जीवन के निर्णयों का मूल्यांकन करने की प्रेरणा देता है कि हमारे कार्य स्वार्थ से प्रेरित हैं या उच्चतर आदर्शों से।

7. भगवद्कृपा और शरणगति की प्राप्ति

जब मनुष्य अपने सभी भ्रमों को भगवान के चरणों में समर्पित कर देता है, तो उसे भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य अनुकंपा और मार्गदर्शन प्राप्त होता है।

8. एकाग्रता और स्मरण शक्ति में सुधार

संस्कृत श्लोकों के नियमित उच्चारण और उनके अर्थ के स्मरण से मस्तिष्क की नसें सक्रिय होती हैं और एकाग्रता बढ़ती है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

भक्तालोक (Bhaktilok.in) पर प्रस्तुत यह आलेख वेदों, पुराणों, महाभारत और श्रीमद्भगवद्गीता के विभिन्न पारंपरिक एवं आधुनिक भाष्यों (जैसे आदि शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदास, और स्वामी गीतानंद जी के दृष्टिकोण) के गहन अध्ययन के आधार पर संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। हमारे मुख्य devotional scholar और Sanskrit linguist इस बात का विशेष ध्यान रखते हैं कि सनातन धर्म के मूल ग्रंथों का मर्म, उनकी प्रामाणिकता और व्याकरणिक शुद्धता किसी भी स्तर पर प्रभावित न हो।

हमारा उद्देश्य पाठकों को सतही धार्मिक जानकारियों के बजाय एक ऐसा गंभीर, विश्लेषणात्मक और आध्यात्मिक मंच प्रदान करना है जहाँ वे वेदों और उपनिषदों की ऋचाओं तथा गीता के श्लोकों को उनके वास्तविक परिप्रेक्ष्य में समझ सकें। यदि आप किसी विशेष श्लोक या प्रसंग पर और अधिक शोधपरक सामग्री चाहते हैं, तो हमारे पोर्टल के अन्य अनुभागों का अन्वेषण कर सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

उत्तर: यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के प्रथम अध्याय (जिसे 'अर्जुनविषादयोग' कहा जाता है) से संबंधित है। इस प्रसंग में अर्जुन युद्धभूमि में अपने सगे-सम्बन्धियों, गुरुओं और मित्रों को देखकर मोहग्रस्त हो जाते हैं और युद्ध करने से मना कर देते हैं।

उत्तर: अर्जुन इस श्लोक के माध्यम से यह दर्शा रहे हैं कि जिस राज्य, सुख, भोग और वैभव की प्राप्ति के लिए वे अपने परिजनों को जीवित देखना चाहते थे और जिनके लिए वे राज्य की कामना कर रहे थे, आज वे ही सभी लोग अपने प्राणों और धन को दांव पर लगाकर युद्धभूमि में उनके सामने खड़े हैं। ऐसे में उनके वध से मिलने वाले राज्य का क्या लाभ?

उत्तर: हाँ, यह आधुनिक जीवन में भी पूरी तरह प्रासंगिक है। आज के समय में मनुष्य अपने परिवार, करियर, और भौतिक सुखों के प्रति अत्यधिक आसक्त रहता है और जब कभी उसे अपने जीवन में नैतिक कर्तव्यों और पारिवारिक मोह के बीच चयन करना पड़ता है, तो वह इसी प्रकार के 'अर्जुन विषाद' का अनुभव करता है। गीता हमें इसी मोह से उबरने की प्रेरणा देती है।

उत्तर: प्रथम अध्याय का मुख्य संदेश यह दिखाना है कि किस प्रकार मनुष्य अज्ञानता, भय, मोह और मानसिक दुर्बलता के कारण अपने कर्तव्य से विमुख हो जाता है। यह अध्याय संपूर्ण गीता के ज्ञान की पृष्ठभूमि तैयार करता है, जहाँ भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन की इस कमजोरी को दूर कर उन्हें सच्चा ज्ञान प्रदान करते हैं।

उत्तर: भक्तालोक (Bhaktilok.in) सनातन संस्कृति के ग्रंथों का प्रामाणिक, व्याकरण की दृष्टि से शुद्ध और दार्शनिक रूप से गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है। यहाँ पाठकों को शब्दार्थ, भावार्थ, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और मानसिक-आध्यात्मिक लाभों का एक समग्र संकलन मिलता है, जो उनके आध्यात्मिक विकास में सहायक होता है।

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सत्यं शिवं सुंदरम् - सनातन संस्कृति के प्रचार-प्रसार हेतु समर्पित

विरोधाभास / Paradox

अर्जुन के लिए राज्य का अर्थ था अपने परिवार का सुख, पर अब वही परिवार युद्ध में आमने-सामने है। For Arjuna, the kingdom meant happiness for his family, but now that same family is arrayed against him.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 1: अर्जुन विषाद योग (Arjuna Vishada Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 33 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 33/47 70% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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