श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 11 (विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga))

अध्याय 11 · श्लोक 32

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 55 3 मिनट का पठन 147 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
श्रीभगवानुवाच । कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः । ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ॥ ३२॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

20 पद
श्रीभगवान्
भगवान्
उवाच
बोले
कालः
काल (समय)
अस्मि
हूँ
लोकक्षयकृत्
लोकों का क्षय करने वाला
प्रवृद्धः
प्रवृद्ध
लोकान्
लोकों को
समाहर्तुम्
संहार करने के लिए
इह
यहाँ
प्रवृत्तः
प्रवृत्त
ऋते
बिना
अपि
भी
त्वाम्
तुम्हारे
न
नहीं
भविष्यन्ति
होंगे
सर्वे
सभी
ये
जो
अवस्थिताः
स्थित हैं
प्रत्यनीकेषु
विपक्षी सेनाओं में
योधाः
योद्धा।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

श्रीभगवान् बोले: मैं प्रवृद्ध काल हूँ, लोकों का क्षय करने वाला, और इन लोकों का संहार करने के लिए यहाँ प्रवृत्त हुआ हूँ। तुम्हारे बिना भी, इन विपक्षी सेनाओं में स्थित सभी योद्धा नहीं रहेंगे।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

भगवान् स्वयं को काल (समय) बताते हैं, जो सबका संहार करने वाला है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

श्रीभगवान् बोले: मैं प्रवृद्ध काल हूँ, लोकों का क्षय करने वाला, और इन लोकों का संहार करने के लिए यहाँ प्रवृत्त हुआ हूँ। तुम्हारे बिना भी, इन विपक्षी सेनाओं में स्थित सभी योद्धा नहीं रहेंगे।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

भगवान् ही काल के रूप में सबका अंत करते हैं। अर्जुन को केवल निमित्त बनना है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 11: विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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