श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 11 (विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga))

अध्याय 11 · श्लोक 33

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 55 2 मिनट का पठन 121 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून्भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् । मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ॥ ३३॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

19 पद
तस्मात्
इसलिए
त्वम्
तुम
उत्तिष्ठ
उठो
यशः
यश
लभस्व
प्राप्त करो
जित्वा
जीतकर
शत्रून्
शत्रुओं को
भुङ्क्ष्व
भोगो
राज्यम्
राज्य
समृद्धम्
समृद्ध
मया
मेरे द्वारा
एव
ही
एते
ये
निहताः
मारे गए
पूर्वम्
पहले
एव
ही
निमित्तमात्रम्
निमित्त मात्र
भव
हो
सव्यसाचिन्
हे सव्यसाची।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

इसलिए तू उठ, यश प्राप्त कर, शत्रुओं को जीतकर समृद्ध राज्य का भोग कर। ये सब तो मेरे द्वारा पहले ही मारे जा चुके हैं। हे सव्यसाची, तू निमित्त मात्र बन।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

भगवान् अर्जुन को युद्ध के लिए प्रेरित करते हैं और बताते हैं कि वे तो केवल निमित्त हैं।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

इसलिए तू उठ, यश प्राप्त कर, शत्रुओं को जीतकर समृद्ध राज्य का भोग कर। ये सब तो मेरे द्वारा पहले ही मारे जा चुके हैं। हे सव्यसाची, तू निमित्त मात्र बन।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

मनुष्य केवल कर्तव्य का पालन करता है, फल तो भगवान् के हाथ में है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 11: विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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