मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
सञ्जय उवाच । एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी । नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य ॥ ३५॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
17 पदसञ्जय
संजय
उवाच
बोले
एतत्
यह
श्रुत्वा
सुनकर
वचनम्
वचन
केशवस्य
केशव (कृष्ण) का
कृताञ्जलि
हाथ जोड़े हुए
वेपमानः
कांपता हुआ
किरीटी
मुकुटधारी (अर्जुन)
नमस्कृत्वा
नमस्कार करके
भूयः
फिर
एव
ही
आह
बोला
कृष्णम्
कृष्ण से
सगद्गदम्
गद्गद स्वर में
भीतभीतः
बहुत भयभीत होकर
प्रणम्य
प्रणाम करके।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
संजय बोले: हे राजन्, केशव के इन वचनों को सुनकर मुकुटधारी अर्जुन ने हाथ जोड़कर, कांपते हुए, नमस्कार किया और बहुत भयभीत होकर प्रणाम करके फिर कृष्ण से गद्गद स्वर में कहा।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
अर्जुन की भयभीत अवस्था का वर्णन।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
हे राजन्, केशव के इन वचनों को सुनकर मुकुटधारी अर्जुन ने हाथ जोड़कर, कांपते हुए, नमस्कार किया और बहुत भयभीत होकर प्रणाम करके फिर कृष्ण से गद्गद स्वर में कहा।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
भगवान् के वचन सुनकर भक्त का हृदय द्रवित हो जाता है।