श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 11 (विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga))

अध्याय 11 · श्लोक 36

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 55 2 मिनट का पठन 123 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अर्जुन उवाच । स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च । रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः ॥ ३६॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

18 पद
अर्जुन
अर्जुन
उवाच
बोले
स्थाने
उचित ही
हृषीकेश
हे हृषीकेश
तव
आपकी
प्रकीर्त्या
कीर्ति से
जगत्
जगत्
प्रहृष्यति
हर्षित होता है
अनुरज्यते
अनुरक्त होता है
च
और
रक्षांसि
राक्षस
भीतानि
भयभीत
दिशः
दिशाओं में
द्रवन्ति
भागते हैं
सर्वे
सभी
नमस्यन्ति
नमस्कार करते हैं
च
और
सिद्धसङ्घाः
सिद्धों के समूह।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

अर्जुन बोले: हे हृषीकेश, आपकी कीर्ति से जगत् का हर्षित और अनुरक्त होना उचित ही है; राक्षस भयभीत होकर दिशाओं में भाग रहे हैं और सभी सिद्धों के समूह आपको नमस्कार कर रहे हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

अर्जुन भगवान् की स्तुति करते हुए कहते हैं कि सब उनकी महिमा से प्रभावित हैं।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

हे हृषीकेश, आपकी कीर्ति से जगत् का हर्षित और अनुरक्त होना उचित ही है; राक्षस भयभीत होकर दिशाओं में भाग रहे हैं और सभी सिद्धों के समूह आपको नमस्कार कर रहे हैं।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

भगवान् की महिमा सबको आकर्षित करती है और असुरों में भय उत्पन्न करती है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 11: विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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