मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे । अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत् ॥ ३७॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
19 पदकस्मात्
क्यों
च
और
ते
आपको
न
नहीं
नमेरन्
नमस्कार करेंगे
महात्मन्
हे महात्मन्
गरीयसे
महान
ब्रह्मणः
ब्रह्मा से भी
अपि
भी
आदिकर्त्रे
आदि के कर्ता
अनन्त
हे अनन्त
देवेश
हे देवेश
जगन्निवास
हे जगन्निवास
त्वम्
आप
अक्षरम्
अविनाशी
सत्
सत्
असत्
असत्
तत्परम्
उससे परे
यत्
जो।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे महात्मन्, आप सबसे श्रेष्ठ हैं, ब्रह्मा जी के भी आदिकर्ता हैं; फिर आपको सब लोग नमस्कार क्यों न करें? हे अनन्त, हे देवेश, हे जगन्निवास, आप वह अक्षर (अविनाशी) हैं, जो सत् और असत् से परे है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
अर्जुन भगवान् की सर्वोच्चता का वर्णन करते हैं।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
हे महात्मन्, आप सबसे श्रेष्ठ हैं, ब्रह्मा जी के भी आदिकर्ता हैं; फिर आपको सब लोग नमस्कार क्यों न करें? हे अनन्त, हे देवेश, हे जगन्निवास, आप वह अक्षर (अविनाशी) हैं, जो सत् और असत् से परे है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
भगवान् सभी से परे और सबके मूल कारण हैं।