मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणस्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् । वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप ॥ ३८॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
20 पदत्वम्
आप
आदिदेवः
आदि देव
पुरुषः
पुरुष
पुराणः
पुरातन
त्वम्
आप
अस्य
इस
विश्वस्य
विश्व के
परम्
परम
निधानम्
आश्रय
वेत्ता
जानने वाले
असि
हैं
वेद्यम्
जानने योग्य
च
और
परम्
परम
च
और
धाम
धाम
त्वया
आपसे
ततम्
व्याप्त
विश्वम्
विश्व
अनन्तरूप
हे अनंतरूप।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
आप आदिदेव, पुरातन पुरुष हैं; आप इस विश्व के परम आश्रय हैं। आप ज्ञाता, ज्ञेय और परम धाम हैं। हे अनंतरूप, यह सम्पूर्ण विश्व आपसे ही व्याप्त है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भगवान् के सर्वव्यापकत्व का वर्णन।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
आप आदिदेव, पुरातन पुरुष हैं; आप इस विश्व के परम आश्रय हैं। आप ज्ञाता, ज्ञेय और परम धाम हैं। हे अनंतरूप, यह सम्पूर्ण विश्व आपसे ही व्याप्त है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
भगवान् ही सब कुछ हैं; वे सर्वव्यापी हैं।