श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 11 (विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga))

अध्याय 11 · श्लोक 38

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 55 2 मिनट का पठन 107 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणस्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् । वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप ॥ ३८॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

20 पद
त्वम्
आप
आदिदेवः
आदि देव
पुरुषः
पुरुष
पुराणः
पुरातन
त्वम्
आप
अस्य
इस
विश्वस्य
विश्व के
परम्
परम
निधानम्
आश्रय
वेत्ता
जानने वाले
असि
हैं
वेद्यम्
जानने योग्य
च
और
परम्
परम
च
और
धाम
धाम
त्वया
आपसे
ततम्
व्याप्त
विश्वम्
विश्व
अनन्तरूप
हे अनंतरूप।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

आप आदिदेव, पुरातन पुरुष हैं; आप इस विश्व के परम आश्रय हैं। आप ज्ञाता, ज्ञेय और परम धाम हैं। हे अनंतरूप, यह सम्पूर्ण विश्व आपसे ही व्याप्त है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

भगवान् के सर्वव्यापकत्व का वर्णन।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

आप आदिदेव, पुरातन पुरुष हैं; आप इस विश्व के परम आश्रय हैं। आप ज्ञाता, ज्ञेय और परम धाम हैं। हे अनंतरूप, यह सम्पूर्ण विश्व आपसे ही व्याप्त है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

भगवान् ही सब कुछ हैं; वे सर्वव्यापी हैं।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 11: विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga)
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श्लोक 38/55 69% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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