मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति । अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्प्रणयेन वापि ॥ ४१॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
19 पदसखा
मित्र
इति
इस प्रकार
मत्वा
मानकर
प्रसभम्
प्रगल्भता से
यत्
जो
उक्तम्
कहा गया
हे कृष्ण
हे कृष्ण
हे यादव
हे यादव
हे सख
हे मित्र
इति
इस प्रकार
अजानता
न जानते हुए
महिमानम्
महिमा को
तव
आपकी
इदम्
यह
मया
मेरे द्वारा
प्रमादात्
प्रमाद से
प्रणयेन
स्नेह से
वा
या
अपि
भी।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
आपको मित्र मानकर प्रगल्भता से जो कुछ भी मैंने कहा – "हे कृष्ण, हे यादव, हे सखे" – वह सब आपकी इस महिमा को न जानते हुए, प्रमाद या स्नेहवश कहा गया।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
अर्जुन अपनी पूर्व की अनौपचारिक बातों के लिए क्षमा माँगते हैं।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
आपको मित्र मानकर प्रगल्भता से जो कुछ भी मैंने कहा – "हे कृष्ण, हे यादव, हे सखे" – वह सब आपकी इस महिमा को न जानते हुए, प्रमाद या स्नेहवश कहा गया।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
भगवान् के प्रति हमारा व्यवहार श्रद्धापूर्ण होना चाहिए, न कि साधारण मित्रवत्।