मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु । एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ॥ ४२॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
20 पदयत्
जो
च
और
अवहासार्थम्
हँसी के लिए
असत्कृतः
अपमानित
असि
हुए
विहार
विहार में
शय्या
शय्या पर
आसन
आसन पर
भोजनेषु
भोजन में
एकः
अकेले
अथवा
अथवा
अपि
भी
अच्युत
हे अच्युत
तत्
उस
समक्षम्
उन सबके सामने
तत्
उसके लिए
क्षामये
क्षमा माँगता हूँ
त्वाम्
आपसे
अहम्
मैं
अप्रमेयम्
हे अप्रमेय।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
और विहार, शय्या, आसन और भोजन में हँसी-मजाक के लिए जो आपका अपमान किया गया हो, चाहे अकेले में या दूसरों के सामने, हे अच्युत, उस सबके लिए मैं आपसे, हे अप्रमेय, क्षमा माँगता हूँ।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
अर्जुन सभी परिस्थितियों में अनजाने में किए गए अपमान की क्षमा माँगते हैं।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
और विहार, शय्या, आसन और भोजन में हँसी-मजाक के लिए जो आपका अपमान किया गया हो, चाहे अकेले में या दूसरों के सामने, हे अच्युत, उस सबके लिए मैं आपसे, हे अप्रमेय, क्षमा माँगता हूँ।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
भगवान् के प्रति हर प्रकार की असावधानी के लिए क्षमा माँगनी चाहिए।