मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् । न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव ॥ ४३॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
19 पदपिता
पिता
असि
हैं
लोकस्य
लोकों के
चराचरस्य
चर और अचर सहित
त्वम्
आप
अस्य
इसके
पूज्यः
पूज्य
च
और
गुरुः
गुरु
गरीयान्
महान्
न
नहीं
त्वत्समः
आपके समान
अस्ति
है
अभ्यधिकः
श्रेष्ठ
कुतः
कहाँ
अन्यः
अन्य
लोकत्रये
तीनों लोकों में
अपि
भी
अप्रतिमप्रभाव
हे अप्रतिम प्रभाव वाले।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
आप इस चराचर जगत् के पिता हैं, आप इसके पूज्य और महान् गुरु हैं। आपके समान कोई नहीं है; तीनों लोकों में आपसे श्रेष्ठ और कौन हो सकता है, हे अप्रतिम प्रभाव वाले?
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
अर्जुन भगवान् की अतुलनीयता का वर्णन करते हैं।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
आप इस चराचर जगत् के पिता हैं, आप इसके पूज्य और महान् गुरु हैं। आपके समान कोई नहीं है; तीनों लोकों में आपसे श्रेष्ठ और कौन हो सकता है, हे अप्रतिम प्रभाव वाले?
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
भगवान् सर्वश्रेष्ठ हैं, उनके समान कोई नहीं।