मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् । पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम् ॥ ४४॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
20 पदतस्मात्
इसलिए
प्रणम्य
प्रणाम करके
प्रणिधाय
झुकाकर
कायम्
शरीर को
प्रसादये
प्रसन्न करना चाहता हूँ
त्वाम्
आपको
अहम्
मैं
ईशम्
ईश
ईड्यम्
स्तुत्य
पिता
पिता
इव
जैसे
पुत्रस्य
पुत्र के
सखा
मित्र
इव
जैसे
सख्युः
मित्र के
प्रियः
प्रिय
प्रियाया
प्रिया के
अर्हसि
आप योग्य हैं
देव
हे देव
सोढुम्
सहने के लिए।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
इसलिए शरीर झुकाकर प्रणाम करके मैं आपको, हे ईश, हे स्तुत्य, प्रसन्न करना चाहता हूँ। जैसे पिता पुत्र के अपराध सह लेता है, मित्र मित्र के, और प्रिय प्रिया के, वैसे ही आप मेरे अपराध सहने के योग्य हैं, हे देव।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
अर्जुन पिता-पुत्र आदि के उदाहरण देकर क्षमा की याचना करते हैं।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
इसलिए शरीर झुकाकर प्रणाम करके मैं आपको, हे ईश, हे स्तुत्य, प्रसन्न करना चाहता हूँ। जैसे पिता पुत्र के अपराध सह लेता है, मित्र मित्र के, और प्रिय प्रिया के, वैसे ही आप मेरे अपराध सहने के योग्य हैं, हे देव।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
भगवान् से क्षमा माँगने में संकोच नहीं करना चाहिए, वे दयालु हैं।