श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 11 (विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga))

अध्याय 11 · श्लोक 45

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 55 2 मिनट का पठन 111 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे । तदेव मे दर्शय देव रूपं प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥ ४५॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

18 पद
अदृष्टपूर्वम्
पहले न देखा हुआ
हृषितः
हर्षित
अस्मि
हूँ
दृष्ट्वा
देखकर
भयेन
भय से
च
और
प्रव्यथितम्
व्याकुल
मनः
मन
मे
मेरा
तत्
वह
एव
ही
मे
मुझे
दर्शय
दिखाइए
देव
हे देव
रूपम्
रूप
प्रसीद
प्रसन्न हों
देवेश
हे देवेश
जगन्निवास
हे जगन्निवास।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

पहले न देखे हुए इस रूप को देखकर मैं हर्षित हूँ, और साथ ही भय से मेरा मन व्याकुल है। हे देव, मुझे वही (पूर्व) रूप दिखाइए। हे देवेश, हे जगन्निवास, प्रसन्न हों।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

अर्जुन विराट रूप देखकर हर्षित और भयभीत हैं, अब वे चतुर्भुज रूप देखना चाहते हैं।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

पहले न देखे हुए इस रूप को देखकर मैं हर्षित हूँ, और साथ ही भय से मेरा मन व्याकुल है। हे देव, मुझे वही (पूर्व) रूप दिखाइए। हे देवेश, हे जगन्निवास, प्रसन्न हों।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

भगवान् के विराट रूप के दर्शन के बाद भी भक्त उनके सगुण रूप के दर्शन चाहता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 11: विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga)
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श्लोक 45/55 82% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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