श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 11 (विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga))

अध्याय 11 · श्लोक 46

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 55 2 मिनट का पठन 118 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तमिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव । तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते ॥ ४६॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

15 पद
किरीटिनम्
मुकुट धारण किए हुए
गदिनम्
गदा धारण किए हुए
चक्रहस्तम्
हाथ में चक्र लिए हुए
इच्छामि
चाहता हूँ
त्वाम्
आपको
द्रष्टुम्
देखना
अहम्
मैं
तथैव
वैसे ही
तेन
उस
एव
ही
रूपेण
रूप से
चतुर्भुजेन
चार भुजाओं वाले
सहस्रबाहो
हे सहस्रबाहो
भव
हों
विश्वमूर्ते
हे विश्वमूर्ते।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

मैं आपको वैसे ही मुकुट धारण किए, गदा और हाथ में चक्र लिए देखना चाहता हूँ। हे सहस्रबाहो, हे विश्वमूर्ते, आप उसी चतुर्भुज रूप में प्रकट हों।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

अर्जुन स्पष्ट रूप से चतुर्भुज विष्णु रूप की याचना करते हैं।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

मैं आपको वैसे ही मुकुट धारण किए, गदा और हाथ में चक्र लिए देखना चाहता हूँ। हे सहस्रबाहो, हे विश्वमूर्ते, आप उसी चतुर्भुज रूप में प्रकट हों।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

भगवान् के सगुण रूप की उपासना भक्त के लिए सहज और प्रिय है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 11: विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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