मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
श्रीभगवानुवाच । मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् । तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम् ॥ ४७॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
20 पदश्रीभगवान्
भगवान्
उवाच
बोले
मया
मेरे द्वारा
प्रसन्नेन
प्रसन्न होकर
तव
तुम्हें
अर्जुन
हे अर्जुन
इदम्
यह
रूपम्
रूप
परम्
परम
दर्शितम्
दिखाया गया
आत्मयोगात्
अपने योग से
तेजोमयम्
तेजोमय
विश्वम्
विश्वरूप
अनन्तम्
अनंत
आद्यम्
आदि
यत्
जो
मे
मेरा
त्वदन्येन
तुम्हारे अलावा किसी और ने
न
नहीं
दृष्टपूर्वम्
पहले देखा।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
श्रीभगवान् बोले: हे अर्जुन, मैंने प्रसन्न होकर तुम्हें अपने योग से यह परम तेजोमय, विश्वरूप, अनंत और आदि रूप दिखाया है, जो मेरा है और तुम्हारे अतिरिक्त किसी और ने पहले नहीं देखा।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भगवान् बताते हैं कि यह रूप उनकी कृपा से ही अर्जुन ने देखा।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
हे अर्जुन, मैंने प्रसन्न होकर तुम्हें अपने योग से यह परम तेजोमय, विश्वरूप, अनंत और आदि रूप दिखाया है, जो मेरा है और तुम्हारे अतिरिक्त किसी और ने पहले नहीं देखा।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
भगवान् के दर्शन केवल उनकी कृपा से ही संभव हैं।