मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैर्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः । एवंरूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर ॥ ४८॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
19 पदन
नहीं
वेद
वेद
यज्ञ
यज्ञ
अध्ययनैः
अध्ययन से
न
नहीं
दानैः
दान से
न
नहीं
च
और
क्रियाभिः
क्रियाओं से
न
नहीं
तपोभिः
तप से
उग्रैः
उग्र
एवंरूपः
इस प्रकार का रूप
शक्यः
संभव
अहम्
मैं
नृलोके
मनुष्य लोक में
द्रष्टुम्
देखना
त्वदन्येन
तुम्हारे अलावा किसी और से
कुरुप्रवीर
हे कुरुश्रेष्ठ।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे कुरुश्रेष्ठ, वेद-यज्ञ के अध्ययन से, दान से, क्रियाओं से, या उग्र तप से भी मनुष्य लोक में मैं इस रूप में तुम्हारे अतिरिक्त किसी और के द्वारा देखा जाना संभव नहीं है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भगवान् इस रूप की दुर्लभता बताते हैं।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
हे कुरुश्रेष्ठ, वेद-यज्ञ के अध्ययन से, दान से, क्रियाओं से, या उग्र तप से भी मनुष्य लोक में मैं इस रूप में तुम्हारे अतिरिक्त किसी और के द्वारा देखा जाना संभव नहीं है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
भगवान् के विराट रूप के दर्शन अत्यंत दुर्लभ हैं।