मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम् । व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य ॥ ४९॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
22 पदमा
मत
ते
तुम्हें
व्यथा
पीड़ा
मा
मत
च
और
विमूढभावः
विमूढ भाव
दृष्ट्वा
देखकर
रूपम्
रूप
घोरम्
घोर
ईदृक्
ऐसा
मम
मेरा
इदम्
यह
व्यपेतभीः
भय रहित
प्रीतमनाः
प्रसन्न मन वाला
पुनः
फिर
त्वम्
तुम
तत्
उस
एव
ही
मे
मेरे
रूपम्
रूप
इदम्
इस
प्रपश्य
देखो।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
मेरे इस घोर रूप को देखकर तुम्हें पीड़ा या विमूढभाव नहीं होना चाहिए। भय रहित और प्रसन्न मन से तुम मेरे इस पूर्व रूप को फिर से देखो।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भगवान् अर्जुन को भय मुक्त करके पुनः चतुर्भुज रूप दिखाने का वचन देते हैं।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
मेरे इस घोर रूप को देखकर तुम्हें पीड़ा या विमूढभाव नहीं होना चाहिए। भय रहित और प्रसन्न मन से तुम मेरे इस पूर्व रूप को फिर से देखो।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
भगवान् भक्त के भय को दूर कर उसे शांति प्रदान करते हैं।