श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 11 (विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga))

अध्याय 11 · श्लोक 49

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 55 2 मिनट का पठन 118 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम् । व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य ॥ ४९॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

22 पद
मा
मत
ते
तुम्हें
व्यथा
पीड़ा
मा
मत
च
और
विमूढभावः
विमूढ भाव
दृष्ट्वा
देखकर
रूपम्
रूप
घोरम्
घोर
ईदृक्
ऐसा
मम
मेरा
इदम्
यह
व्यपेतभीः
भय रहित
प्रीतमनाः
प्रसन्न मन वाला
पुनः
फिर
त्वम्
तुम
तत्
उस
एव
ही
मे
मेरे
रूपम्
रूप
इदम्
इस
प्रपश्य
देखो।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

मेरे इस घोर रूप को देखकर तुम्हें पीड़ा या विमूढभाव नहीं होना चाहिए। भय रहित और प्रसन्न मन से तुम मेरे इस पूर्व रूप को फिर से देखो।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

भगवान् अर्जुन को भय मुक्त करके पुनः चतुर्भुज रूप दिखाने का वचन देते हैं।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

मेरे इस घोर रूप को देखकर तुम्हें पीड़ा या विमूढभाव नहीं होना चाहिए। भय रहित और प्रसन्न मन से तुम मेरे इस पूर्व रूप को फिर से देखो।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

भगवान् भक्त के भय को दूर कर उसे शांति प्रदान करते हैं।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 11: विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga)
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श्लोक 49/55 89% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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