श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 11 (विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga))

अध्याय 11 · श्लोक 50

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 55 2 मिनट का पठन 129 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
सञ्जय उवाच । इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः । आश्वासयामास च भीतमेनं भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा ॥ ५०॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

19 पद
सञ्जय
संजय
उवाच
बोले
इति
इस प्रकार
अर्जुनम्
अर्जुन से
वासुदेवः
वासुदेव (कृष्ण)
तथा
इस प्रकार
उक्त्वा
कहकर
स्वकम्
अपना
रूपम्
रूप
दर्शयामास
दिखाया
भूयः
फिर
आश्वासयामास
आश्वासन दिया
च
और
भीतम्
भयभीत
एनम्
इस (अर्जुन) को
भूत्वा
होकर
पुनः
फिर
सौम्यवपुः
सौम्य शरीर वाले
महात्मा
महात्मा।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

संजय बोले: इस प्रकार अर्जुन से कहकर वासुदेव ने फिर अपना (चतुर्भुज) रूप दिखाया। महात्मा ने पुनः सौम्य रूप धारण कर उस भयभीत अर्जुन को आश्वासन दिया।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

संजय बताते हैं कि कृष्ण ने चतुर्भुज रूप दिखाकर अर्जुन को आश्वस्त किया।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

इस प्रकार अर्जुन से कहकर वासुदेव ने फिर अपना (चतुर्भुज) रूप दिखाया। महात्मा ने पुनः सौम्य रूप धारण कर उस भयभीत अर्जुन को आश्वासन दिया।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

भगवान् के सौम्य रूप का दर्शन भक्त को शांति प्रदान करता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 11: विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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