मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः । यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥ ११॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
17 पदयत्
which
अक्षरम्
imperishable
वेदविदः
knowers of the Vedas
वदन्ति
declare
विशन्ति
enter
यत्
which
यतयः
ascetics
वीतरागाः
free from attachment
यत्
which
इच्छन्तः
desiring
ब्रह्मचर्यम्
celibacy/continence
चरन्ति
practice
तत्
that
ते
to you
पदम्
goal
संग्रहेण
briefly
प्रवक्ष्ये
I shall declare.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
जिसे वेदज्ञ पुरुष अक्षर (अविनाशी) कहते हैं, जिसमें वीतराग यति (संन्यासी) प्रवेश करते हैं, और जिसकी इच्छा से लोग ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, उस पद को मैं तुम्हें संक्षेप में बताऊंगा।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
कृष्ण अब उस परम धाम का वर्णन करने जा रहे हैं जो वेदों का लक्ष्य है और जिसके लिए साधक तपस्या करते हैं। Krishna now prepares to describe that supreme abode, the goal of the Vedas and the aspiration of all seekers.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
कृष्ण कहते हैं: जिसे वेदज्ञ पुरुष अक्षर (अविनाशी) कहते हैं, जिसमें वीतराग यति (संन्यासी) प्रवेश करते हैं, और जिसकी इच्छा से लोग ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, उस पद को मैं तुम्हें संक्षेप में बताऊंगा। Krishna says: That which the knowers of the Vedas declare as the Imperishable, into which ascetics free from attachment enter, and desiring which they practice celibacy—that goal I shall declare to you briefly.
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
यह श्लोक साधना के उच्चतम लक्ष्य की ओर संकेत करता है। सभी वैदिक साधनाओं का अंतिम ध्येय उस अक्षर तत्त्व की प्राप्ति है। This verse points to the highest goal of spiritual practice. All Vedic disciplines aim at attaining that Imperishable Reality.