मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च । मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ॥ १२॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
12 पदसर्वद्वाराणि
all doors (of the senses)
संयम्य
restraining
मनः
mind
हृदि
in the heart
निरुध्य
confining
च
and
मूर्ध्नि
in the head
आधाय
placing
आत्मनः
his
प्राणम्
life force
आस्थितः
established
योगधारणाम्
in yogic concentration.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
सब इन्द्रियों के द्वारों को रोककर, मन को हृदय में रोककर, और प्राण को मस्तक में स्थापित करके, योगधारणा में स्थित होकर...
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यह श्लोक योग की आंतरिक प्रक्रिया का वर्णन करता है: इन्द्रियों को वश में कर, मन को हृदय में एकाग्र कर, और प्राण को सहस्रार चक्र में ले जाकर ध्यान स्थिर करना। This verse describes the internal yogic process: controlling the senses, focusing the mind in the heart, and raising the prana to the crown chakra to stabilize meditation.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
कृष्ण कहते हैं: सब इन्द्रियों के द्वारों को रोककर, मन को हृदय में रोककर, और प्राण को मस्तक में स्थापित करके, योगधारणा में स्थित होकर... Krishna says: By closing all the senses, confining the mind in the heart, and fixing the life force in the head, established in yogic concentration...
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
यह श्लोक ध्यान की तकनीकी प्रक्रिया बताता है। बाहरी इन्द्रियों से संयम और आंतरिक ऊर्जा के उर्ध्वगमन से गहन ध्यान संभव होता है। This verse explains the technical process of meditation. Withdrawal from the senses and raising the inner energy upward enables deep meditation.