मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः । तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ॥ १४॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
12 पदअनन्यचेताः
with mind fixed on Me alone
सततम्
constantly
यः
who
माम्
Me
स्मरति
remembers
नित्यशः
always
तस्य
to him
अहम्
I
सुलभः
easily attainable
पार्थ
O Partha
नित्ययुक्तस्य
ever-steadfast
योगिनः
of the yogi.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे पार्थ! जो योगी अनन्यचित्त होकर निरन्तर मेरा स्मरण करता है, उस नित्ययुक्त योगी के लिए मैं सुलभ हूँ।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यह श्लोक भक्ति योग के सार को बताता है: अनन्य भाव से निरंतर भगवान का स्मरण करने वाले को भगवान सहज ही प्राप्त हो जाते हैं। This verse states the essence of Bhakti Yoga: one who constantly remembers the Lord with single-minded devotion attains Him easily.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
कृष्ण कहते हैं: हे पार्थ! जो योगी अनन्यचित्त होकर निरन्तर मेरा स्मरण करता है, उस नित्ययुक्त योगी के लिए मैं सुलभ हूँ। Krishna says: O Partha, for that yogi who constantly remembers Me with single-minded devotion, I am easily attainable.
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
यहाँ भगवान की कृपा और भक्त की साधना का संगम है। भक्त की निरंतर स्मरण-रूपी साधना भगवान को उसके वश में कर लेती है। Here, the Lord's grace and the devotee's practice meet. The devotee's constant remembrance brings the Lord under his control, so to speak.