मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन । मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥ १६॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
12 पदआब्रह्मभुवनात्
up to the world of Brahma
लोकाः
worlds
पुनरावर्तिनः
subject to return
अर्जुन
O Arjuna
माम्
Me
उपेत्य
having attained
तु
but
कौन्तेय
O son of Kunti
पुनः
again
जन्म
birth
न
not
विद्यते
exists.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे अर्जुन! ब्रह्मलोक पर्यन्त सभी लोक पुनरावर्ती (पुनः लौटने वाले) हैं; परन्तु हे कौन्तेय! मुझको प्राप्त करके पुनर्जन्म नहीं होता।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यह श्लोक बताता है कि उच्चतम लोक (ब्रह्मलोक) भी नाशवान और पुनरावृत्ति वाले हैं, जबकि भगवान की प्राप्ति से पूर्ण मुक्ति मिलती है। This verse states that even the highest heavenly realms are impermanent and involve return, whereas attaining the Lord grants complete liberation.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
कृष्ण कहते हैं: हे अर्जुन! ब्रह्मलोक पर्यन्त सभी लोक पुनरावर्ती (पुनः लौटने वाले) हैं; परन्तु हे कौन्तेय! मुझको प्राप्त करके पुनर्जन्म नहीं होता। Krishna says: O Arjuna, all the worlds up to the realm of Brahma are subject to return. But on attaining Me, O son of Kunti, there is no rebirth.
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
यह श्लोक भगवद्प्राप्ति की अनन्यता को दर्शाता है। सांसारिक स्वर्ग भी अस्थायी हैं, केवल परमात्मा की प्राप्ति ही शाश्वत है। This verse highlights the uniqueness of attaining the Lord. Even heavenly pleasures are temporary; only God-realization is eternal.