मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः । यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति ॥ २०॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
14 पदपरः
supreme
तस्मात्
than that
तु
but
भावः
existence
अन्यः
other
अव्यक्तः
unmanifest
अव्यक्तात्
than the unmanifest
सनातनः
eternal
यः
which
सः
that
सर्वेषु भूतेषु
in all beings
नश्यत्सु
when they perish
न
not
विनश्यति
perishes.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
किन्तु उस अव्यक्त (प्रकृति) से भी परे एक अन्य सनातन अव्यक्त भाव (तत्त्व) है, जो सब प्राणियों के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होता।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यह श्लोक परमात्मा के उस परतत्त्व की ओर इशारा करता है जो प्रकृति के अव्यक्त रूप से भी परे है, जो नित्य और अविनाशी है। This verse points to the Supreme Reality that transcends even the unmanifest Prakriti, which is eternal and imperishable.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
कृष्ण कहते हैं: किन्तु उस अव्यक्त (प्रकृति) से भी परे एक अन्य सनातन अव्यक्त भाव (तत्त्व) है, जो सब प्राणियों के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होता। Krishna says: But there is another, unmanifest existence, eternal and transcending that unmanifest, which does not perish when all beings perish.
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
यह श्लोक परम सत्य की ओर ले जाता है, जो समस्त सृष्टि का आधार है और स्वयं अविनाशी है। यही लक्ष्य है जिसे साधक प्राप्त करना चाहता है। This verse leads to the Supreme Truth, the basis of all creation, which itself is imperishable. This is the goal the seeker aspires to attain.