मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम् । यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥ २१॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
16 पदअव्यक्तः
the unmanifest
अक्षरः
imperishable
इति
thus
उक्तः
is said
तम्
that
आहुः
they call
परमाम्
supreme
गतिम्
goal
यम्
which
प्राप्य
attaining
न
not
निवर्तन्ते
return
तत्
that
धाम
abode
परमम्
supreme
मम
My.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
वह अव्यक्त अक्षर कहा गया है, उसे ही परम गति बताते हैं; जिसे प्राप्त करके (पुरुष) लौटकर नहीं आते, वह मेरा परम धाम है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यह श्लोक उस परम धाम की पहचान कराता है जो अव्यक्त और अक्षर है, भगवान का नित्य धाम, जहाँ से कोई नहीं लौटता। This verse identifies that supreme abode, which is unmanifest and imperishable, the eternal abode of the Lord, from which there is no return.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
कृष्ण कहते हैं: वह अव्यक्त अक्षर कहा गया है, उसे ही परम गति बताते हैं; जिसे प्राप्त करके (पुरुष) लौटकर नहीं आते, वह मेरा परम धाम है। Krishna says: That which is called the Unmanifest and Imperishable, that is said to be the supreme goal. That is My supreme abode, attaining which one does not return.
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
यहाँ भगवान अपने धाम का वर्णन करते हैं, जो अविनाशी और परम गति है। उसे प्राप्त कर लेने पर जन्म-मृत्यु का चक्र समाप्त हो जाता है। Here the Lord describes His abode, which is imperishable and the supreme goal. Attaining it ends the cycle of birth and death.