मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया । यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् ॥ २२॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
15 पदपुरुषः
Purusha
सः
that
परः
Supreme
पार्थ
O Partha
भक्त्या
by devotion
लभ्यः
attainable
तु
but
अनन्यया
unswerving
यस्य
whose
अन्तःस्थानि
dwell within
भूतानि
all beings
येन
by whom
सर्वम्
all
इदम्
this
ततम्
is pervaded.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे पार्थ! वह परम पुरुष, जिसके अन्तर्गत सब प्राणी स्थित हैं और जिससे यह सम्पूर्ण जगत व्याप्त है, अनन्य भक्ति से ही प्राप्त किया जा सकता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यह श्लोक बताता है कि परमात्मा सर्वव्यापी और सबके अन्तर्यामी हैं, और उन्हें केवल अनन्य भक्ति से ही पाया जा सकता है। This verse states that the Supreme Lord is all-pervading and the inner dweller of all, and He can be attained only through unswerving devotion.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
कृष्ण कहते हैं: हे पार्थ! वह परम पुरुष, जिसके अन्तर्गत सब प्राणी स्थित हैं और जिससे यह सम्पूर्ण जगत व्याप्त है, अनन्य भक्ति से ही प्राप्त किया जा सकता है। Krishna says: O Partha, that Supreme Purusha, in whom all beings dwell and by whom all this is pervaded, is attainable only through unswerving devotion.
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
यह श्लोक भक्ति मार्ग की महिमा बताता है। ज्ञान, कर्म, योग सभी साधनाएँ अंततः भक्ति में ही पर्यवसित होती हैं। अनन्य भक्ति से ही परमात्मा सुलभ होते हैं। This verse glorifies the path of devotion. All paths—knowledge, action, yoga—ultimately culminate in devotion. The Lord is easily attainable through unswerving devotion.