श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 8 (अक्षर ब्रह्म योग (Aksara Brahma Yoga))

अध्याय 8 · श्लोक 6

अक्षर ब्रह्म योग (Aksara Brahma Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 28 4 मिनट का पठन 116 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् । तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥ ६॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
यम् यम्
whatever
वा अपि
indeed
स्मरन्
remembering
भावम्
state of being
त्यजति
gives up
अन्ते
at the end
कलेवरम्
the body
तम् तम्
that very
एव
indeed
एति
attains
कौन्तेय
O son of Kunti
सदा
always
तद्भावभावितः
absorbed in that thought.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे कुन्तीपुत्र! मनुष्य अन्तकाल में जिस-जिस भाव का स्मरण करता हुआ शरीर त्यागता है, उस-उसको ही प्राप्त होता है, क्योंकि वह सदा उसी भाव से भावित रहता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

यह श्लोक बताता है कि मृत्यु के समय का विचार जीवन भर के संस्कारों पर निर्भर करता है। जैसा हम जीवन में सोचते हैं, वैसा ही अन्तकाल में याद आता है और वैसी ही गति मिलती है। This verse states that the thought at death depends on lifelong impressions. As we think throughout life, so we remember at death and attain accordingly.

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

कृष्ण कहते हैं: हे कुन्तीपुत्र! मनुष्य अन्तकाल में जिस-जिस भाव का स्मरण करता हुआ शरीर त्यागता है, उस-उसको ही प्राप्त होता है, क्योंकि वह सदा उसी भाव से भावित रहता है। Krishna says: O son of Kunti, whatever state of being one remembers when he gives up his body at the end, that state he attains, for he is ever absorbed in that thought.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

यह श्लोक मन के संस्कारों की शक्ति दिखाता है। हम जैसे विचारों को निरंतर पालते हैं, अन्तकाल में वे ही उभरते हैं। इसलिए सदा उच्च भाव रखना चाहिए। This verse reveals the power of mental impressions. The thoughts we constantly entertain arise at death. Hence, one should always cultivate noble thoughts.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 8: अक्षर ब्रह्म योग (Aksara Brahma Yoga)
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श्लोक 6/28 21% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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