मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना । परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन् ॥ ८॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
10 पदअभ्यासयोगयुक्तेन
by the yoga of constant practice
चेतसा
with the mind
न
not
अन्यगामिना
going elsewhere
परमम्
Supreme
पुरुषम्
Person
दिव्यम्
divine
याति
attains
पार्थ
O Partha
अनुचिन्तयन्
meditating.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे पार्थ! अभ्यासयोग से युक्त तथा अन्य विषयों को न जाने वाले चित्त द्वारा परम दिव्य पुरुष का अनुचिन्तन करता हुआ योगी उन्हें प्राप्त होता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यह श्लोक ध्यान की विधि बताता है: निरंतर अभ्यास और एकाग्र मन से परमात्मा का चिंतन करने पर वह प्राप्त होता है। This verse describes the method of meditation: through constant practice and a focused mind, one attains the Supreme.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
कृष्ण कहते हैं: हे पार्थ! अभ्यासयोग से युक्त तथा अन्य विषयों को न जाने वाले चित्त द्वारा परम दिव्य पुरुष का अनुचिन्तन करता हुआ योगी उन्हें प्राप्त होता है। Krishna says: O Partha, by meditating on the Supreme Divine Person with a mind engaged in the yoga of constant practice and not wandering elsewhere, one attains Him.
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
यहाँ ध्यान के लिए दो शर्तें हैं: नियमित अभ्यास और एकाग्रता। बिना अभ्यास के मन भटकता है और बिना एकाग्रता के ध्यान गहरा नहीं होता। Here two conditions for meditation are given: regular practice and concentration. Without practice, the mind wanders; without concentration, meditation is not deep.