आज का पंचांग | सूर्योदय: ०५:४५ AM | सूर्यास्त: ०६:५० PM
प्रामाणिक मंदिर विवरण

दशाश्वमेध मंदिर, प्रयागराज - Dashashwamedh Temple, Prayagraj: The Sacred Site of Brahma's Ashwamedha Yajna

270 दर्शनार्थी | प्रकाशित: 22 March 2026
इतिहास व दर्शन पढ़ें
दर्शन निर्देशिका (Temple Stats)
Brahma आराध्य देव
6 AM - 9 PM दर्शन समय
आरती समय आरती समय

मंदिर संक्षिप्त विवरण

आराध्य देव Brahma
स्थान / पता Dashashwamedh Temple, Daraganj, Prayagraj, Uttar Pradesh
आकार:
कंट्रास्ट:

🕉️ दशाश्वमेध मंदिर, प्रयागराज

भगवान ब्रह्मा के अश्वमेध यज्ञ की पावन स्थली (Dashashwamedh Temple, Prayagraj)

संगम नगरी प्रयागराज के हृदय में स्थित एक प्राचीन एवं दिव्य मंदिर

🌟 परिचय: दशाश्वमेध मंदिर का धार्मिक एवं ऐतिहासिक महत्व

प्रयागराज (इलाहाबाद) की पवित्र नगरी में गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम के समीप स्थित दशाश्वमेध मंदिर एक अत्यंत प्राचीन और श्रद्धास्पद धार्मिक स्थल है। यह मंदिर न केवल अपनी ऐतिहासिकता के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि यहाँ की आध्यात्मिक ऊर्जा हर साल लाखों भक्तों और पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती है।

इस मंदिर का विशेष महत्व इसलिए भी है क्योंकि यहाँ भगवान ब्रह्मा ने दस अश्वमेध यज्ञ किए थे, जिससे इस स्थान का नाम "दशाश्वमेध" पड़ा। यह स्थल सनातन धर्म में यज्ञ, तप और सृजन की शक्ति का प्रतीक माना जाता है। मंदिर परिसर की शांति, संगम के निकट होने का पुण्य प्रभाव और यहाँ होने वाली विशेष पूजाएँ इसे तीर्थराज प्रयाग के प्रमुख धार्मिक केंद्रों में से एक बनाती हैं।

📍 स्थान और कैसे पहुंचें (Location & How to Reach)

दशाश्वमेध मंदिर उत्तर प्रदेश के प्रयागराज शहर में दारागंज क्षेत्र में, संगम के पास स्थित है। यह स्थान प्रयागराज के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है और शहर के केंद्र से आसानी से पहुँचा जा सकता है।

  • निकटतम प्रमुख शहर: वाराणसी (लगभग 120 किमी), लखनऊ (लगभग 200 किमी)
  • रेल मार्ग: प्रयागराज जंक्शन (इलाहाबाद) और प्रयागराज छिवकी स्टेशन प्रमुख रेलवे स्टेशन हैं, जो देशभर से जुड़े हैं। स्टेशन से मंदिर लगभग 5-6 किमी दूर है।
  • सड़क मार्ग: प्रयागराज सड़क मार्ग द्वारा अच्छी तरह जुड़ा है। नेशनल हाईवे 19, 30 और 35 शहर से होकर गुजरते हैं। शहर के किसी भी हिस्से से ऑटो, टैक्सी या सिटी बस द्वारा मंदिर पहुँचा जा सकता है।
  • हवाई मार्ग: निकटतम हवाई अड्डा प्रयागराज एयरपोर्ट (बमरौली) है, जो शहर से लगभग 12-14 किमी दूर है। यहाँ से दिल्ली, मुंबई, बैंगलोर आदि के लिए नियमित उड़ानें हैं।
🗺️

दारागंज, प्रयागराज, उत्तर प्रदेश

संगम से दूरी: ~1 किमी
प्रयागराज जंक्शन से: ~5 किमी

📜 पौराणिक कथा: भगवान ब्रह्मा के दस अश्वमेध यज्ञ

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा ने इस पवित्र स्थल पर दस अश्वमेध यज्ञ (अश्वमेध यज्ञ) किए थे। "अश्वमेध" एक अति उच्च कोटि का यज्ञ है, जिसे राजसूय यज्ञ के समकक्ष माना जाता है। ब्रह्मा जी ने यहाँ यज्ञ करके सृष्टि की समृद्धि और धर्म की स्थापना की प्रार्थना की थी। तभी से इस स्थान का नाम "दशाश्वमेध" (दश = दस + अश्वमेध) पड़ा।

एक अन्य कथा के अनुसार, जब भगवान राम ने अयोध्या लौटने के बाद अश्वमेध यज्ञ किया, तो उनके घोड़े को इसी क्षेत्र में लाया गया था और यहाँ विशेष अनुष्ठान किए गए थे। यह स्थल सदियों से तीर्थराज प्रयाग के सबसे पवित्र स्थानों में गिना जाता है।

मंदिर की वर्तमान संरचना हालाँकि कई शताब्दियों में बनी है, लेकिन इसकी जड़ें प्राचीन काल से जुड़ी हैं। यहाँ स्थित प्राचीन शिवलिंग और ब्रह्मा जी की मूर्ति इस बात के प्रमाण हैं कि यह स्थल अनादिकाल से पूजनीय रहा है।

🕉️

"यहाँ ब्रह्मा जी ने दस अश्वमेध यज्ञ किए थे"

मान्यता: यहाँ सच्चे मन से प्रार्थना करने से यज्ञ के समान पुण्य की प्राप्ति होती है और जीवन की बाधाएँ दूर होती हैं।

🏛️ वास्तुकला और मुख्य आकर्षण

🙏 प्रमुख देवता एवं मूर्तियाँ

मंदिर के गर्भगृह में भगवान ब्रह्मा की प्रतिमा विराजमान है, जो चार मुखों वाली है। साथ ही यहाँ एक प्राचीन शिवलिंग भी स्थापित है, जिसकी पूजा का विशेष महत्व है। मंदिर परिसर में भगवान विष्णु, माता पार्वती, गणेश जी और हनुमान जी की भी सुंदर मूर्तियाँ हैं।

🏞️ संगम का निकटस्थ स्थान

मंदिर से मात्र 1 किलोमीटर की दूरी पर त्रिवेणी संगम है, जहाँ गंगा, यमुना और सरस्वती का मिलन होता है। इसलिए मंदिर में दर्शन के बाद संगम स्नान का पुण्य लाभ भी आसानी से प्राप्त किया जा सकता है। संगम पर होने वाली शाम की आरती का दृश्य अत्यंत मनमोहक होता है।

🎨 प्राचीन शिल्पकला

मंदिर की दीवारों पर उकेरी गई नक्काशी, पत्थरों पर बनी धार्मिक आकृतियाँ और प्राचीन शैली के स्तंभ इसे ऐतिहासिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बनाते हैं। यहाँ की वास्तुकला उत्तर भारतीय मंदिर शैली का अद्भुत उदाहरण है।

✨ धार्मिक महत्व एवं विशेष अनुष्ठान

  • यज्ञ का पुण्य: यहाँ दर्शन मात्र से अश्वमेध यज्ञ के समान फल की प्राप्ति होती है, ऐसी धारणा है।
  • पितृ तर्पण: संगम के निकट होने के कारण यहाँ पितरों को तर्पण देने का विशेष विधान है।
  • कल्पवास का केंद्र: माघ मेले के दौरान यहाँ हजारों कल्पवासी निवास करते हैं और पूजा-अर्चना करते हैं।
  • सृष्टि के रचयिता की उपासना: ब्रह्मा जी की पूजा दुर्लभ है, इसलिए यह स्थल विशेष फलदायी माना जाता है।
  • वैवाहिक समस्याओं का निवारण: मान्यता है कि यहाँ विवाह संबंधी बाधाएँ दूर होती हैं और सुखद दांपत्य जीवन की प्राप्ति होती है।

🎉 प्रमुख त्योहार और आयोजन

🌊

कुंभ मेला / अर्धकुंभ

प्रयागराज का कुंभ मेला विश्व प्रसिद्ध है। दशाश्वमेध मंदिर में इस दौरान विशेष पूजा, यज्ञ और भव्य शोभायात्राएँ आयोजित की जाती हैं।

🌞

माघ मेला (कल्पवास)

जनवरी-फरवरी में माघ मास में लगने वाला यह मेला पूरे एक माह चलता है। इस अवधि में मंदिर में नित्य अनुष्ठान और भजन-कीर्तन होते हैं।

🕯️

कार्तिक पूर्णिमा

इस दिन संगम स्नान का विशेष महत्व है और मंदिर में दीपदान, गंगा आरती एवं विशेष पूजा का आयोजन होता है।

🏞️ दशाश्वमेध मंदिर के आस-पास के प्रमुख दर्शनीय स्थल

  • त्रिवेणी संगम: गंगा, यमुना और सरस्वती का पवित्र संगम, मंदिर से लगभग 1 किमी दूर। यहाँ नौका विहार और शाम की आरती अवश्य देखें।
  • अक्षयवट (अक्षय वट): प्राचीन पीपल का वृक्ष, जिसके नीचे भगवान राम ने तपस्या की थी। यह भी संगम के समीप है।
  • हनुमान मंदिर (संगम तट): लेटे हुए हनुमान जी का अद्भुत मंदिर, संगम के किनारे स्थित।
  • आलोपी देवी मंदिर: शक्तिपीठ के रूप में प्रसिद्ध, यहाँ माँ दुर्गा की पूजा होती है।
  • शंकर विमान मंडपम् (भारद्वाज आश्रम): भगवान शंकर और ऋषि भारद्वाज से जुड़ा ऐतिहासिक स्थल।
  • इलाहाबाद किला: अशोक स्तंभ और पातालपुरी मंदिर सहित ऐतिहासिक किला, संगम के पास ही।
  • आनंद भवन: नेहरू-गांधी परिवार का ऐतिहासिक घर, जो अब एक संग्रहालय है।
📌 यात्रा टिप: एक ही यात्रा में दशाश्वमेध मंदिर, संगम स्नान, अक्षयवट दर्शन और हनुमान मंदिर की परिक्रमा कर सकते हैं। सुबह के समय यह क्षेत्र अधिक शांत और पवित्र रहता है।

🗓️ यात्रा का सर्वोत्तम समय और सुझाव

🌤️ सर्वोत्तम समय

प्रयागराज की यात्रा के लिए अक्टूबर से मार्च का समय सबसे उपयुक्त है। इस दौरान मौसम सुहावना होता है। विशेष रूप से माघ मास (जनवरी-फरवरी) में यहाँ माघ मेले का आयोजन होता है, जो एक अद्वितीय आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करता है। कुंभ मेले के वर्षों में (हर 12 वर्ष में) यह क्षेत्र अत्यंत जीवंत होता है।

📝 यात्रा सुझाव

  • सुबह जल्दी संगम स्नान करें, फिर मंदिर में दर्शन करें।
  • शाम की गंगा आरती (संगम या दशाश्वमेध घाट पर) अवश्य देखें।
  • मेले के समय भीड़ अधिक होती है, सुरक्षा का ध्यान रखें और कीमती सामान संभालकर रखें।
  • पूजा सामग्री मंदिर के बाहर आसानी से उपलब्ध है।
  • मंदिर परिसर और घाटों की सफ़ाई बनाए रखने में सहयोग करें।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: दशाश्वमेध मंदिर कहाँ स्थित है?

उत्तर: यह मंदिर उत्तर प्रदेश के प्रयागराज (पूर्व में इलाहाबाद) में दारागंज क्षेत्र में, त्रिवेणी संगम के समीप स्थित है।

प्रश्न 2: इस मंदिर का नाम "दशाश्वमेध" क्यों पड़ा?

उत्तर: पौराणिक मान्यता के अनुसार, भगवान ब्रह्मा ने यहाँ दस अश्वमेध यज्ञ किए थे, जिससे यह नाम पड़ा। "दश" का अर्थ दस और "अश्वमेध" एक प्रकार का यज्ञ है।

प्रश्न 3: मंदिर के दर्शन का समय क्या है?

उत्तर: मंदिर प्रातः 5:00 बजे से रात्रि 9:00 बजे तक खुला रहता है। विशेष अवसरों पर समय में परिवर्तन हो सकता है।

प्रश्न 4: क्या यहाँ प्रवेश शुल्क है?

उत्तर: नहीं, मंदिर में कोई प्रवेश शुल्क नहीं है।

प्रश्न 5: क्या यहाँ कुंभ मेले में विशेष व्यवस्था होती है?

उत्तर: हाँ, कुंभ एवं अर्धकुंभ के दौरान यहाँ विशेष पूजा, यज्ञ और शोभायात्राएँ आयोजित की जाती हैं। सुरक्षा एवं सुविधाओं की व्यवस्था की जाती है।

प्रश्न 6: यहाँ आसपास ठहरने की क्या सुविधा है?

उत्तर: दारागंज और सिविल लाइन्स क्षेत्र में कई होटल, धर्मशालाएँ और गेस्ट हाउस उपलब्ध हैं। मेले के समय अस्थायी शिविर भी लगाए जाते हैं।

प्रश्न 7: क्या यहाँ विशेष पूजा का आयोजन कराया जा सकता है?

उत्तर: हाँ, मंदिर प्रबंधन से संपर्क करके आप विशेष अनुष्ठान, यज्ञ या रुद्राभिषेक करा सकते हैं।

📝 दशाश्वमेध मंदिर की यात्रा का आध्यात्मिक लाभ

दशाश्वमेध मंदिर, प्रयागराज सनातन धर्म के उन दुर्लभ स्थलों में से एक है जहाँ भगवान ब्रह्मा की पूजा का विशेष महत्व है। यहाँ की ऊर्जा, संगम की पवित्रता और प्राचीन काल से चली आ रही यज्ञ परंपरा इसे एक अद्वितीय तीर्थस्थल बनाती है।

चाहे आप कुंभ मेले के समय आएं या किसी सामान्य दिन, यह मंदिर आपको गहरी आध्यात्मिक शांति और सकारात्मकता का अनुभव कराता है। यहाँ आकर संगम का पावन स्नान, अक्षयवट के दर्शन और दशाश्वमेध मंदिर की पूजा का संयोजन जीवन को धन्य बना देता है।

प्रयागराज की यात्रा के दौरान इस मंदिर को अपने कार्यक्रम में अवश्य शामिल करें और ब्रह्मा जी के यज्ञ स्थली की पावनता का अनुभव करें।

🙏 ॐ सृष्टिकर्त्रे नमः ।। हरिः ॐ तत् सत् ।।

🕉️ दशाश्वमेध मंदिर, प्रयागराज
जहाँ ब्रह्मा जी ने दस अश्वमेध यज्ञ किए

सनातन संस्कृति के विभिन्न त्यौहारों, व्रत और व्रत कथाओं की सटीक जानकारी के लिए हमारे सनातन कैलेंडर २०२६ का अवलोकन करें।

प्रामाणिक मंदिर दर्शन मार्गदर्शिका

यह मंदिर विवरण भक्तिलोक संपादकीय मंडल द्वारा प्रामाणिक धर्मग्रंथों, ऐतिहासिक शोधपत्रों एवं संबंधित मंदिर समितियों द्वारा जारी की गई अधिकारिक सूचनाओं के आधार पर समीक्षित एवं सत्यापित किया गया है।

इतिहास एवं तथ्य-जांचित अंतिम सत्यापन तिथि: 22 Mar 2026

दर्शनार्थियों के अनुभव (0)

अपना दर्शन अनुभव व समीक्षा साझा करें

विवरण कॉपी कर लिया गया है!
(function() { let voiceCounter = 0; const answers = { "ध्यान": "ध्यान मन को स्थिर करने और भीतर विद्यमान चैतन्य (आत्मा) से जुड़ने का वैज्ञानिक मार्ग है। दैनिक १०-१५ मिनट का ध्यान तनाव को कम करता है, मस्तिष्क की एकाग्रता बढ़ाता है और आत्मिक शांति प्रदान करता है। साधना खंड में हमारे 'श्लोक उच्चारण' व '४३२Hz ध्यान संगीत' का उपयोग करें।", "पंचांग": "वैदिक पंचांग काल-गणना की अत्यंत सटीक वैज्ञानिक प्रणाली है। यह मुख्य रूप से पांच अंगों: तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण पर आधारित होती है। इसके माध्यम से सौर तथा चंद्र गतियों के अनुसार शुभ मुहूर्त और राहु काल की स्थिति की गणना की जाती है।", "चार धाम": "सनातन संस्कृति में चार धाम - उत्तर में श्री बद्रीनाथ, पश्चिम में द्वारकाधीश, पूर्व में जगन्नाथ पुरी और दक्षिण में रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग हैं। इन चारों धामों की स्थापना आदि गुरु शंकराचार्य जी ने देश की भौगोलिक एवं आध्यात्मिक एकता को अक्षउन बना रखने के उद्देश्य से की थी।", "आज का पंचांग": "आज का पंचांग देखने के लिए कृपया हमारे 'आज का वैदिक पंचांग' विजेट को देखें। वर्तमान दिन के अनुसार तिथि तथा राहु काल की सटीक गणना वहां उपलब्ध है।", "गायत्री": "गायत्री महामंत्र (ॐ भूर्भुवः स्वः...) समस्त वेदों का सार माना गया है। यह सविता देव (सूर्य) की उपासना करता है ताकि हमारी बुद्धि सन्मार्ग की ओर प्रेरित हो। इसका नित्य उच्चारण बुद्धि तीव्र करता है।", "केदारनाथ": "केदारनाथ मंदिर उत्तराखंड के पवित्र हिमालय क्षेत्र में मन्दाकिनी नदी के तट पर स्थित है। यह शिव जी के १२ ज्योतिर्लिंगों में से एक है। इसकी स्थापना पांडवों द्वारा की गई मानी जाती है और आदि गुरु शंकराचार्य ने इसका पुनरुद्धार किया था।" }; function matchResponse(query) { query = query.toLowerCase(); if (query.includes("ध्यान") || query.includes("meditation") || query.includes("sadhana")) { return answers["ध्यान"]; } else if (query.includes("पंचांग") || query.includes("panchang")) { return answers["पंचांग"]; } else if (query.includes("धाम") || query.includes("dham")) { return answers["चार धाम"]; } else if (query.includes("गायत्री") || query.includes("gayatri")) { return answers["गायत्री"]; } else if (query.includes("केदारनाथ") || query.includes("kedarnath")) { return answers["केदारनाथ"]; } else { return "वत्स! आपका प्रश्न अत्यंत कल्याणकारी है। सनातन मार्ग ज्ञान, भक्ति और कर्म का मार्ग है। मन को शांत कर सत्यपथ पर चलें। क्या आप किसी विशिष्ट तीर्थ यात्रा अथवा दैनिक साधना के बारे में जानना चाहते हैं?"; } } window.readGuruVoice = function(text, btnId) { window.speechSynthesis.cancel(); const utterance = new SpeechSynthesisUtterance(text); utterance.lang = 'hi-IN'; utterance.rate = 0.85; const btn = document.getElementById(btnId); if (btn) { btn.innerHTML = ' श्रवण जारी है...'; } utterance.onend = () => { if (btn) btn.innerHTML = ' सुनें (Listen)'; }; utterance.onerror = () => { if (btn) btn.innerHTML = ' सुनें (Listen)'; }; window.speechSynthesis.speak(utterance); }; function initChatbot() { const launcher = document.getElementById('chatLauncher'); const drawer = document.getElementById('chatDrawer'); const closeBtn = document.getElementById('chatClose'); const input = document.getElementById('chatInput'); const sendBtn = document.getElementById('chatSendBtn'); const body = document.getElementById('chatBody'); if (!launcher || !drawer || !closeBtn || !input || !sendBtn || !body) { return; } launcher.addEventListener('click', function(e) { e.stopPropagation(); drawer.classList.toggle('open'); }); closeBtn.addEventListener('click', function(e) { e.stopPropagation(); drawer.classList.remove('open'); }); input.addEventListener('keydown', e => { if (e.key === 'Enter') { submitGlobalMessage(); } }); sendBtn.addEventListener('click', submitGlobalMessage); window.sendGlobalSuggestion = function(text) { input.value = text; submitGlobalMessage(); }; function submitGlobalMessage() { const query = input.value.trim(); if (query === "") return; // User Message bubble const userMsg = document.createElement('div'); userMsg.className = 'chat-msg user'; userMsg.textContent = query; body.appendChild(userMsg); input.value = ""; body.scrollTop = body.scrollHeight; // Typing Indicator const typingIndicator = document.createElement('div'); typingIndicator.className = 'chat-msg guru typing-indicator-container'; typingIndicator.innerHTML = `
`; body.appendChild(typingIndicator); body.scrollTop = body.scrollHeight; // Response Delay setTimeout(() => { if (body.contains(typingIndicator)) { body.removeChild(typingIndicator); } const responseText = matchResponse(query); const guruMsg = document.createElement('div'); guruMsg.className = 'chat-msg guru'; voiceCounter++; const btnId = `global-guru-speech-${voiceCounter}`; guruMsg.innerHTML = `
${responseText}
`; body.appendChild(guruMsg); body.scrollTop = body.scrollHeight; }, 1200); } } if (document.readyState === 'loading') { document.addEventListener('DOMContentLoaded', initChatbot); } else { initChatbot(); } })(); �थ": "केदारनाथ मंदिर उत्तराखंड के पवित्र हिमालय क्षेत्र में मन्दाकिनी नदी के तट पर स्थित है। यह शिव जी के १२ ज्योतिर्लिंगों में से एक है। इसकी स्थापना पांडवों द्वारा की गई मानी जाती है और आदि गुरु शंकराचार्य ने इसका पुनरुद्धार किया था।" }; function matchResponse(query) { query = query.toLowerCase(); if (query.includes("ध्यान") || query.includes("meditation") || query.includes("sadhana")) { return answers["ध्यान"]; } else if (query.includes("पंचांग") || query.includes("panchang")) { return answers["पंचांग"]; } else if (query.includes("धाम") || query.includes("dham")) { return answers["चार धाम"]; } else if (query.includes("गायत्री") || query.includes("gayatri")) { return answers["गायत्री"]; } else if (query.includes("केदारनाथ") || query.includes("kedarnath")) { return answers["केदारनाथ"]; } else { return "वत्स! आपका प्रश्न अत्यंत कल्याणकारी है। सनातन मार्ग ज्ञान, भक्ति और कर्म का मार्ग है। मन को शांत कर सत्यपथ पर चलें। क्या आप किसी विशिष्ट तीर्थ यात्रा अथवा दैनिक साधना के बारे में जानना चाहते हैं?"; } } let voiceCounter = 0; window.readGuruVoice = function(text, btnId) { window.speechSynthesis.cancel(); const utterance = new SpeechSynthesisUtterance(text); utterance.lang = 'hi-IN'; utterance.rate = 0.85; const btn = document.getElementById(btnId); btn.innerHTML = ' श्रवण जारी है...'; utterance.onend = () => { btn.innerHTML = ' सुनें (Listen)'; }; utterance.onerror = () => { btn.innerHTML = ' सुनें (Listen)'; }; window.speechSynthesis.speak(utterance); }; function submitGlobalMessage() { const query = input.value.trim(); if (query === "") return; // User Message bubble const userMsg = document.createElement('div'); userMsg.className = 'chat-msg user'; userMsg.textContent = query; body.appendChild(userMsg); input.value = ""; body.scrollTop = body.scrollHeight; // Typing Indicator const typingIndicator = document.createElement('div'); typingIndicator.className = 'chat-msg guru typing-indicator-container'; typingIndicator.innerHTML = `
`; body.appendChild(typingIndicator); body.scrollTop = body.scrollHeight; // Response Delay setTimeout(() => { body.removeChild(typingIndicator); const responseText = matchResponse(query); const guruMsg = document.createElement('div'); guruMsg.className = 'chat-msg guru'; voiceCounter++; const btnId = `global-guru-speech-${voiceCounter}`; guruMsg.innerHTML = `
${responseText}
`; body.appendChild(guruMsg); body.scrollTop = body.scrollHeight; }, 1200); } });