जिन्हा दे सिर उत्ते हाथ मैया दा (Jihna de ser ute hath gura da Lyrics in Hindi) - Durga Bhajan - Bhaktilok
अनादि काल से जगत जननी आदिशक्ति माँ दुर्गा की महिमा का गान सनातन संस्कृति में सर्वोपरि रहा है। माता महालक्ष्मी, महासरस्वती और महाकाली का समेकित स्वरूप संपूर्ण ब्रह्मांड की चेतना का आधार है। प्रस्तुत भजन "जिन्हा दे सिर उत्ते हाथ मैया दा" देवी माँ के असीम वात्सल्य, परम कृपा और शरणागत की रक्षा के संकल्प को अत्यंत सरस एवं भावपूर्ण शैली में व्यक्त करता है। पंजाबी और हिंदी मिश्रित लोक-भक्ति परंपरा की यह रचना साधक के अंतःकरण में अदम्य आत्मबल, सुरक्षा का भाव और दिव्य ऊर्जा का संचार करती है। जब किसी साधक के मस्तक पर जगत जननी का अभय हाथ हो जाता है, तो संसार के सभी भय, बाधाएं और संताप स्वतः ही तिरोहित हो जाते हैं। श्री दुर्गा चालीसा और दुर्गा सप्तशती के पवित्र मर्म को आत्मसात करने वाले भक्तों के लिए यह भजन ध्यान और संकीर्तन का एक अत्यंत आनंददायक माध्यम है।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
स्थाई (मुखड़ा)
जिन्हा दे सिर उत्ते हाथ मैया दा,
उन्हा नू डर काह्दा ए!
मैया दे दर ते जो झुक जांदा,
उन्हा दा बेड़ा पार हो जांदा ए!
जिन्हा दे सिर उत्ते हाथ मैया दा...
पहला अंतरा
शेरावाली माँ दा दर है ऐसा सच्चा,
इथे आ के जुड़ जांदा हर एक कच्चा-पक्का।
मैया दी ममता दा कोई अंत ना पावे,
जो वी सच्चे मन तों माँ नू धियावे!
उहदा भाग्य चमक जांदा ए,
जिन्हा दे सिर उत्ते हाथ मैया दा...
दूसरा अंतरा
दुखियां दे दुखड़े माँ झटपट मिटांदी,
अंधीया अखियां नू ज्योति ओ दिखांदी।
कोई ना खाली मुड़दा मैया देद्वारे,
झोली भर-भर के बांटे खजाने सारे!
भक्तों का बेड़ा पार हो जांदा ए,
जिन्हा दे सिर उत्ते हाथ मैया दा...
तीसरा अंतरा (समापन)
चरणों च बह के हुण अरज गुजारਾਂ,
जन्मा-जन्मांतरों दी मिटा दे हुण हारां।
'भक्तिलोक' गावे महिमा माँ शेरावाली दी,
झोली भर दे साडी वी दाती महारानी दी!
जयकारा मैया शेरावाली दा बोल साचे दरबार की जय!
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
यह भजन केवल शब्दों की माला नहीं है, बल्कि उस अगाध और अलौकिक विश्वास का जीवंत दस्तावेज है जो एक भक्त अपनी आराध्या देवी माँ दुर्गा के प्रति रखता है। भजन की प्रत्येक पंक्ति में माँ के ममतामयी स्वभाव और उनकी सर्वशक्तिमान सत्ता का गुणगान किया गया है।
स्थाई का भाव
"जिन्हा दे सिर उत्ते हाथ मैया दा, उन्हा नू डर काह्दा ए!"—इस पंक्ति का अर्थ है कि जिस मनुष्य के मस्तक पर जगत जननी आदिशक्ति माँ दुर्गा का अभय वरदहस्त हो, उसे संसार में किसी भी प्रकार के भय, संकट या अमंगल से डरने की कोई आवश्यकता नहीं है। जो भक्त अपने अहंकार को त्यागकर माता के चरणों में नतमस्तक हो जाता है, उसका जीवन न केवल संवर जाता है, बल्कि भवसागर से उसका बेड़ा पार हो जाता है।
अंतरों का विस्तृत भावार्थ
माता शेरावाली का दरबार ऐसा पावन और अलौकिक है जहाँ हर दीन-दुखी, पापी और अज्ञानी को शरण मिलती है। माँ की ममता की कोई सीमा नहीं है। जिस प्रकार एक ममतामयी माता अपनी संतान के हर कष्ट को स्वयं पर सह लेती है, उसी प्रकार जगदम्बा भी अपने भक्तों के सभी संतापों को हर लेती हैं। अंधकार रूपी अज्ञान में भटक रही आत्मा को ज्ञान रूपी ज्योति प्रदान करना ही माँ का स्वभाव है। उनके दरबार से कोई भी भक्त कभी खाली हाथ नहीं लौटता।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
निर्भयता की प्राप्ति
माता के चरणों में शरण लेने से साधक के मन से मृत्यु, पीड़ा और अनिश्चितता का भय हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है।
मानसिक शांति एवं संबल
इस भजन का नियमित श्रवण और संकीर्तन मानसिक तनाव को दूर कर आंतरिक शांति, संतुलन और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है।
भक्ति और समर्पण
यह रचना साधक को अहंकार से मुक्त कर पूर्ण शरणागति (आत्म-समर्पण) का मार्ग दिखाती है, जो मोक्ष का प्रथम द्वार है।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
माता के भजनों का संकीर्तन किसी भी समय किया जा सकता है, परंतु कुछ विशेष अवसरों और समयों पर इसका आध्यात्मिक प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है:
- ब्रह्म मुहूर्त एवं प्रातःकालीन वंदना: सुबह स्नान के पश्चात माता के सम्मुख दीप प्रज्वलित कर इस भजन का स्मरण करने से पूरा दिन सकारात्मक और ऊर्जावान रहता है।
- संध्याकालीन आरती: सूर्यास्त के समय घर के मंदिर में धूप-दीप जलाकर इस भजन को गाने से घर की नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और सुख-शांति का वास होता है।
- नवरात्रोत्सव (चैत्र एवं शारदीय नवरात्रि): नवरात्रि के नौ दिनों में विशेष रूप से दुर्गा भजनों का गान करने से माँ भगवती अतिशीघ्र प्रसन्न होती हैं।
- माता के जागरण और सत्संग: चौकी, माता के जागरण या किसी भी मांगलिक उत्सव पर इस भजन को सामूहिक रूप से गाने से वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो जाता है।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity & Saint
इस भजन की मुख्य आराध्य देवी आदिशक्ति माँ दुर्गा (शेरावाली) हैं, जिन्हें वेदों और पुराणों में ब्रह्मांड की मूल सृजनकर्ता, पालनकर्ता और संहारकर्ता शक्ति के रूप में पूजा गया है। मार्कण्डेय पुराण एवं दुर्गा सप्तशती के अनुसार, जब-जब पृथ्वी पर अधर्म और असुरों का अत्याचार बढ़ा है, तब-तब माता ने विभिन्न रूपों (महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती) में प्रकट होकर धर्म की स्थापना की है।
यह लोक-भजन किसी एक विशिष्ट संत की रचना न होकर पंजाब और उत्तर भारत की समृद्ध लोक-भक्ति परंपरा से निकला है, जिसे पीढ़ियों से संतों, लोक-गायकों और माता के भक्तों द्वारा मौखिक एवं लिखित रूप से आगे बढ़ाया गया है।
भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
यह भजन हिंदी और पंजाबी की लोक-भाषा (सरल ब्रज-अवधि और पंजाबी मिश्रित बोलचाल) में र इसकी रचना की गई है। इसमें प्रयुक्त शब्द अत्यंत सरल, हृदयग्राही और सीधे मन को छूने वाले हैं।
काव्य शैली की दृष्टि से यह एक गेय पद है, जिसे ढोलक, मंजीरे और हारमोनियम की थाप पर आसानी से गाया जा सकता है। लोकगीतों की तरह इसमें टेक (स्थाई) और अंतरे की सुव्यवस्थित संरचना है, जो श्रोताओं को स्वतः ही झूमने और गुनगुनाने पर विवश कर देती है।
भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons
अटूट विश्वास (Faith)
जीवन के संघर्षों में कभी भी घबराना नहीं चाहिए। ईश्वर और गुरु पर विश्वास ही सबसे बड़ी पूंजी है।
अहंकार का त्याग (Humility)
माता के दरबार में वही सफल होता है जो अपना अहंकार छोड़कर एक विनम्र बालक की तरह झुकता है।
करुणा और सेवा (Compassion)
जिस प्रकार माँ सभी दुखी जनों के कष्ट हरती है, उसी प्रकार मनुष्य को भी दीन-दुखियों की सहायता करनी चाहिए।
धैर्य और संयम (Patience)
कठिन समय में धैर्य रखना ही सच्ची साधना है। माँ अपने भक्तों की परीक्षा के पश्चात उनकी झोली अवश्य भरती है।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द / वाक्यांश | सरल अर्थ | सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक संदर्भ |
|---|---|---|
| सिर उत्ते हाथ | वरदहस्त / आशीर्वाद | माता की पूर्ण सुरक्षा, कृपा और संरक्षण का प्रतीक। |
| कह्दा ए | किस बात का / क्या आवश्यकता है | जब माँ का आशीर्वाद हो, तो किसी भी भय के लिए कोई स्थान नहीं रहता। |
| शेरावाली | सिंह पर सवार होने वाली | माँ दुर्गा का प्रसिद्ध नाम जो उनके शौर्य और पराक्रम को दर्शाता है। |
| बेड़ा पार | संसार सागर से मुक्ति | जीवन के दुखों और बंधनों से पूर्णतः मुक्त होकर मोक्ष या सफलता प्राप्त करना। |
| अरज गुजारਾਂ | प्रार्थना करना / विनती करना | भक्त का अपनी इष्ट देवी के चरणों में अपनी मनोकामना रखना। |
पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation
भजन की गहराई को समझने के लिए आइए इसकी प्रमुख पंक्तियों का सूक्ष्म भावार्थ देखें:
"जिन्हा दे सिर उत्ते हाथ मैया दा, उन्हा नू डर काह्दा ए!"
व्याख्या: यह पंक्ति साधक को सर्वोच्च मानसिक संबल देती है। जिसके जीवन में देवी माँ की कृपा और आशीर्वाद का छत्रछाया है, उसे दुनिया की किसी भी शक्ति से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है।
"मैया दे दर ते जो झुक जांदा, उन्हा दा बेड़ा पार हो जांदा ए!"
व्याख्या: जो मनुष्य अपनी बुद्धि और अहंकार का त्याग करके माँ के चरणों में समर्पित हो जाता है, उसकी नैया इस भवसागर से आसानी से पार हो जाती है। समर्पण ही भक्ति का मूल मंत्र है।
"दुखियां दे दुखड़े माँ झटपट मिटांदी, अंधीया अखियां नू ज्योति ओ दिखांदी।"
व्याख्या: माँ अपने भक्तों के दुखों को देखकर कभी स्थिर नहीं रह सकतीं। वह तुरंत आकर उनके संकट दूर करती हैं और अज्ञान रूपी अंधकार में डूबे जीवन को प्रकाशमान बनाती हैं।
भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
"ॐ सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके。
शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणि नमोऽस्तु ते॥"
इस महामंत्र के साथ इस भजन का पाठ करने से माँ दुर्गा की विशेष कृपा प्राप्त होती है। इसके अतिरिक्त आप श्री दुर्गा सप्तशती के श्लोकों का भी पाठ कर सकते हैं।
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| भजन का नाम | जिन्हा दे सिर उत्ते हाथ मैया दा (Jihna de ser ute hath gura da) |
|---|---|
| आराध्य देवी | माँ दुर्गा / आदिशक्ति शेरावाली |
| रचनाकार / परंपरा | पारंपरिक लोक भजन (पंजाबी एवं हिंदी लोक-साहित्य) |
| भाषा | हिंदी एवं पंजाबी मिश्रित लोक-भाषा |
| मुख्य थीम | भक्ति, शरणागति, निर्भयता और माँ का वात्सल्य |
| प्रमुख भाव | समर्पण, विश्वास, आनंद और कृतज्ञता |
| उपयुक्त अवसर | नवरात्रि, माता का जागरण, संध्या आरती, दैनिक पूजा |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह सामग्री Bhaktilok.in के विद्वान आचार्यों और संपादकीय टीम द्वारा सनातन परंपरा, लोक-साहित्य और भक्ति संकीर्तन के मानदंडों को ध्यान में रखते हुए तैयार की गई है। इसका उद्देश्य पाठकों को शुद्धतम भजन लिरिक्स और उसका आध्यात्मिक मर्म प्रदान करना है।
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- 1. सनातन धर्म की लोक-भक्ति एवं भजन परंपरा
- 2. मार्कण्डेय पुराण एवं दुर्गा सप्तशती (शास्त्रीय संदर्भ)
- 3. उत्तर भारतीय लोक-गीत एवं माता के जागरण संकलन
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