वैदिक मुहूर्त अन्वेषक 2026-2027
नई दिल्ली (भारत)
साल 2027 कैलेंडर
Vedic Shubh Muhurat Finder

सम्पूर्ण शुभ मुहूर्त 2026-2027
विवाह, गृह प्रवेश, वाहन व मांगलिक समय

सूर्य सिद्धांत एवं मुहूर्त चिंतामणि के शास्त्र-सम्मत नियमों के आधार पर तैयार विवाह लग्न, नूतन गृह प्रवेश, वाहन क्रय, नामकरण, मुंडन व व्यापार आरंभ के सटीक शुभ मुहूर्त।

🛡️ शास्त्र-सम्मत एवं संपादकीय रूप से तैयार सामग्री पंचांग तिथि, नक्षत्र, करण, योग, स्थिर लग्न एवं त्रिबल शुद्धि गणना सहित।
7+ संस्कार श्रेणियां
100+ पावन शुभ मुहूर्त
2026-2027 द्विवर्षीय कैलेंडर

आज का तत्कालीन शुभ मुहूर्त समय

स्थान: नई दिल्ली (भारत) | सूर्योदय: 06:32 AM | सूर्यास्त: 05:36 PM
ब्रह्म मुहूर्त
आगामी
04:56 AM - 05:44 AM
प्रातः जागरण, ईश्वर ध्यान, गायत्री मंत्र जप व अध्ययन हेतु सर्वश्रेष्ठ समय।
अभिजित मुहूर्त
आगामी
11:40 AM - 12:28 PM
दिन का 8वां मुहूर्त, किसी भी शुभ व मांगलिक कार्य की शुरुआत हेतु स्वयंसिद्ध शुभ काल।
विजय मुहूर्त
आगामी
01:16 PM - 02:04 PM
मुकदमा, विवाद समाधान, व्यापारिक समझौते व यात्रा प्रारंभ हेतु विजय कारक समय।
गोधूलि मुहूर्त
आगामी
05:12 PM - 06:00 PM
संध्या कालीन दीप प्रज्वलन, लक्ष्मी पूजन व आरती हेतु अति पावन मुहूर्त।
अमृत काल
आगामी
06:21 PM - 07:51 PM
औषधि सेवन, नवीन योजना व मंगल कार्यों हेतु अमृतमयी फलदायी समय।
राहुकाल (त्याज्य समय)
आगामी
06:32 AM - 07:55 AM
राहुकाल में कोई भी नया कार्य, वाहन क्रय, गृह प्रवेश या यात्रा आरंभ न करें।
संस्कार व प्रयोजन चुनें:

मुंडन संस्कार मुहूर्त (Mundan / Head Shaving) - 2027

प्रथम, तृतीय या पंचम वर्ष में बालक/बालिका के केश संस्कार हेतु शुभ लग्न
3 शुभ तिथियां
25 फरवरी गुरुवार

25 फरवरी 2027

गुरुवार
सर्वोत्तम
तिथि: पंचमी
नक्षत्र: स्वाति
शुभ समय: प्रातः 08:00 से दोपहर 12:20
शुभ लग्न: कुंभ

स्वाति नक्षत्र में मुंडन से बच्चे की स्मरण शक्ति व स्वास्थ्य उत्तम रहता है।

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18 अप्रैल रविवार

18 अप्रैल 2027

रविवार
सर्वश्रेष्ठ
तिथि: द्वादशी
नक्षत्र: उत्तराफाल्गुनी
शुभ समय: प्रातः 07:15 से पूर्वाह्न 11:50
शुभ लग्न: वृषभ

उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र में चूड़ाकर्म से संतान का सर्वांगीण विकास होता है।

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20 मई गुरुवार

20 मई 2027

गुरुवार
अति शुभ
तिथि: पूर्णिमा
नक्षत्र: विशाखा
शुभ समय: प्रातः 06:30 से प्रातः 10:45
शुभ लग्न: मिथुन

वैशाख पूर्णिमा के समीप मुंडन अति पुण्यदायी व मंगलकारी माना गया है।

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वैदिक ज्योतिष एवं पंचांग ज्ञान

शुभ मुहूर्त का सनातन विज्ञान: महत्व, नियम एवं गणना प्रणाली

लेखक: भक्तिलोक वैदिक शोध दल | संदर्भ: सूर्य सिद्धांत, मुहूर्त चिंतामणि, धर्मसिंधु एवं निर्णयसिंधु

1. सनातन धर्म में 'मुहूर्त' का गूढ़ अर्थ एवं उत्पत्ति

वैदिक काल गणना में समय को केवल भौतिक गति नहीं, अपितु एक चेतन शक्ति माना गया है। 'मुहूर्त' शब्द का निर्माण दो शब्दों 'मुहु' (क्षण/पल) और 'ऋत' (सत्य/प्रकृति का नियम) से हुआ है। एक अहोरात्र (24 घंटे) को 30 मुहूर्तों में विभाजित किया जाता है, जिसमें प्रत्येक मुहूर्त का मान 2 घटी अर्थात 48 मिनट होता है। इनमें से 15 मुहूर्त दिन के और 15 मुहूर्त रात्रि के होते हैं।

ऋग्वेद एवं यजुर्वेद में स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि जिस प्रकार भूमि में बीज बोने के लिए ऋतु और अनुकूल जलवायु आवश्यक है, ठीक उसी प्रकार किसी भी नए कार्य, संस्कार, व्यापार या गृह प्रवेश की सफलता उस समय प्रवाहित होने वाली आकाशीय ऊर्जाओं और ग्रहों के अनुग्रह पर निर्भर करती है।

2. पंचांग के पांच मुख्य अंग और मुहूर्त शुद्धि

किसी भी शुभ मुहूर्त का निर्धारण पंचांग के 5 अनिवार्य अंगों के शुद्ध संतुलन द्वारा किया जाता है:

  • तिथि (Tithi): चंद्र मास का दिन। शुभ कार्यों के लिए द्वितीया, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, दशमी, एकादशी व त्रयोदशी श्रेष्ठ मानी जाती हैं। रिक्ता तिथियों (चतुर्थी, नवमी, चतुर्दशी) को त्याज्य माना गया है।
  • वार (Weekday): सोमवार, बुधवार, गुरुवार और शुक्रवार को शुभ व सौम्य वार माना जाता है, जबकि रविवार, मंगलवार और शनिवार क्रूर कार्यों या विशिष्ट अनुष्ठानों हेतु प्रयुक्त होते हैं।
  • नक्षत्र (Nakshatra): 27 नक्षत्रों में रोहिणी, मृगशिरा, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, अनुराधा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, उत्तराभाद्रपद और रेवती को सर्वकार्य सिद्धिप्रद माना गया है।
  • योग (Yoga): 27 योगों में विष्कुंभ, अतिगंड, शूल, व्याघात, वज्र, व्यतीपात और वैधृति जैसे अशुभ योगों को छोड़कर आयुष्मान, सौभाग्य, शोभन, सुकर्मा, धृति आदि में कार्य प्रारंभ किया जाता है।
  • करण (Karana): विष्टि (भद्रा) करण में मांगलिक कार्य सर्वथा वर्जित हैं। बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर और वणिज शुभ करण हैं।

3. विवाह मुहूर्त: त्रिबल शुद्धि एवं मेलापक नियम

विवाह संस्कार 16 संस्कारों में सबसे महत्वपूर्ण संस्कार है क्योंकि यह दो आत्माओं और दो परिवारों का पावन मिलन है। विवाह लग्न तय करते समय तीन ग्रहों का बल देखना अनिवार्य होता है:

  1. सूर्य बल (वर हेतु): वर के लिए सूर्य का गोचर 3, 6, 10, 11वें भाव में शुभ फलदायी होता है।
  2. गुरु बल (कन्या हेतु): कन्या के लिए देवगुरु बृहस्पति का बल 2, 5, 7, 9, 11वें भाव में अखंड सौभाग्य कारक होता है।
  3. चंद्र बल (दोनों हेतु): वर और कन्या दोनों की जन्म राशि से चंद्रमा का 4, 8, 12वें भाव में न होना अनिवार्य है।

इसके अतिरिक्त सिंहस्थ गुरु (जब गुरु सिंह राशि में हों) और चातुर्मास (आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक) में मांगलिक विवाह वर्जित माने जाते हैं।

4. गृह प्रवेश एवं वास्तु शुद्धि के शास्त्रीय नियम

गृह प्रवेश तीन प्रकार का होता है:

  • अपूर्व गृह प्रवेश: नवनिर्मित नवीन भवन में पहली बार प्रवेश।
  • सपूर्व गृह प्रवेश: पुरानी खरीदी गई संपत्ति या यात्रा के बाद पुनः घर में प्रवेश।
  • द्वंद्व गृह प्रवेश: किसी विपत्ति, जीर्णोद्धार या आग/भूकंप के बाद घर में पुनः प्रवेश।

गृह प्रवेश हमेशा स्थिर लग्न (वृषभ, सिंह, वृश्चिक, कुंभ) में किया जाना चाहिए ताकि घर में लक्ष्मी का वास स्थाई रहे। प्रवेश के समय 'नवग्रह शांति', 'वास्तु पुरुष पूजन' और 'मंगल कलश स्थापना' की विधि अवश्य संपन्न करनी चाहिए।

5. अबूझ मुहूर्त क्या होते हैं?

सनातन ज्योतिष में कुछ ऐसे दुर्लभ और स्वयंसिद्ध दिन होते हैं जिन्हें 'अबूझ मुहूर्त' कहा जाता है। इन पावन दिनों में किसी भी पंचांग मिलान, ग्रह दोष या लग्न शुद्धि की आवश्यकता नहीं होती। ये दिन हैं:

  • अक्षय तृतीया (वैशाख शुक्ल तृतीया): दान, विवाह, स्वर्ण क्रय, गृह प्रवेश और नवीन व्यवसाय का स्वयंसिद्ध दिन।
  • देवउठनी एकादशी (कार्तिक शुक्ल एकादशी): चातुर्मास समाप्ति के बाद तुलसी विवाह का पावन अबूझ मुहूर्त।
  • विजयादशमी / दशहरा (आश्विन शुक्ल दशमी): विजय, वाहन क्रय, शस्त्र पूजन और नए उपक्रम का दिन।
  • धनतेरस (कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी): वाहन, स्वर्ण, रजत एवं नवीन संपत्ति क्रय का महामुहूर्त।
  • वसंत पंचमी (माघ शुक्ल पंचमी): विद्यारंभ, नामकरण, संगीत व विवाह संस्कार का शुभ दिन।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

अभिजित मुहूर्त सूर्योदय और सूर्यास्त के ठीक मध्य (सोलर नून) के 24 मिनट पूर्व से 24 मिनट पश्चात (कुल 48 मिनट) तक रहता है। यह समय प्रतिदिन सूर्य के गति और स्थानीय अक्षांश के अनुसार बदलता है। बुधवार को अभिजित मुहूर्त वर्जित माना गया है।

नहीं, राहुकाल में केवल नवीन कार्य का प्रारंभ (आरंभ) वर्जित है। यदि कोई कार्य पहले से चल रहा हो, दैनिक पूजा या नित्य कर्म हो तो उसे रोकने की आवश्यकता नहीं होती।

पुष्य को 27 नक्षत्रों का राजा 'अमृत्य' माना गया है। इसके स्वामी शनि और अधिष्ठाता देव गुरु बृहस्पति हैं। पुष्य नक्षत्र में खरीदी गई धातु (सोना, चांदी) में कभी क्षय नहीं होता और यह निरंतर वृद्धि करती है।

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