भक्ति काव्य व भजन सोमवार विशेष (महादेव शिव व चंद्र देव)

कठोपनिषद श्लोक: उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत

कठोपनिषद के प्रसिद्ध महावाक्य 'उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत' का सम्पूर्ण हिंदी अर्थ, अन्वय, दार्शनिक महत्व और जीवनोपयोगी संदेश पढ़ें। Read complete 2026/11/kathopanishad Uttishthata Jagrata Sloka Meaning.html with Sanskrit meaning & spiritual significance in Hindi.

सनातन वैदिक संस्कृति में उपनिषदों का स्थान सर्वोच्च है। ये ब्रह्मविद्या के वे स्त्रोत हैं जो मानव जीवन को उसकी क्षुद्र सीमाओं से ऊपर उठाकर अनंत ब्रह्मांडीय चेतना से जोड़ते हैं। कृष्ण यजुर्वेद के कठोपनिषद से लिया गया महावाक्य 'उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत' मानवीय चेतना को जगाने वाला एक ऐसा अमर मंत्र है, जिसे स्वामी विवेकानंद ने अपने जीवन का ध्येय वाक्य बनाया था। यह श्लोक केवल कुछ शब्दों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह भौतिकता के अंधकार में भटकती हुई मानव जाति के लिए आध्यात्मिक जागृति का सूर्योदय है।

मूल संस्कृत श्लोक

उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत। क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति॥

पदच्छेद एवं अन्वय

पदच्छेद: उत्तिष्ठत, जाग्रत, प्राप्य, वरान्, निबोधत। क्षुरस्य, धारा, निशिता, दुरत्यया, दुर्गम्, पथः, तत्, कवयो, वदन्ति।

अन्वय: हे मनुष्यों! उत्तिष्ठत जाग्रत, वरान् प्राप्य निबोधत। कवयः क्षुरस्य निशिता धारा दुरत्यया दुर्गं पथः तत् वदन्ति।

शब्दार्थ (Word-by-word Meanings)

संस्कृत पदव्याकरण / पदच्छेदसरल हिंदी अर्थEnglish Meaning
उत्तिष्ठतउत् + स्था धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष, बहुवचनउठो (आलस्य छोड़ो)Arise
जाग्रतजागृ धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष, बहुवचनजागो (सचेत हो जाओ)Awake
प्राप्यप्र + आप् + ल्यप् प्रत्ययप्राप्त करकेHaving attained/reached
वरान्वर (श्रेष्ठ गुरु या ज्ञान) शब्द, द्वितीया विभक्ति, बहुवचनश्रेष्ठ महापुरुषों / ज्ञानियों कोThe best / noble teachers
निबोधतनि + बोध् धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष, बहुवचनज्ञान प्राप्त करो / समझोLearn / Understand deeply
क्षुरस्यक्षुर (उस्तरा) शब्द, षष्ठी विभक्ति, एकवचनउस्तरे कीOf a razor
धारास्त्रीलिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचनधारEdge / Blade
निशिताविशेषण, प्रथमा विभक्ति, एकवचनतेज, पैनीSharpened
दुरत्ययादुर् + अत्यय (कठिनता से पार करने योग्य)पार करने में अत्यंत कठिनDifficult to cross
दुर्गम्विशेषण, द्वितीया विभक्ति, एकवचनदुर्गम, कठिनImpassable / Difficult
पथःपंथन् शब्द, षष्ठी विभक्ति, एकवचनमार्ग कोPath / Way
कवयःकवि (ज्ञानी, मेधावी) शब्द, प्रथमा विभक्ति, बहुवचनज्ञानी, ऋषि-मुनि, विद्वानWise seers / Sages

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या

यमराज नचिकेता को उपदेश देते हुए कहते हैं कि हे मनुष्यों! अपने भीतर छिपी अनंत शक्ति को पहचानो। अज्ञान और प्रमाद की गहरी नींद से उठो, जागो और अपने से वरिष्ठ, ज्ञानी, श्रेष्ठ महापुरुषों (गुरुओं) के सान्निध्य को प्राप्त कर उस परम सत्य या आत्मज्ञान को भली-भांति समझो। जिस प्रकार उस्तरे की धार अत्यंत पैनी होती है, उस पर चलना कठिन होता है और उसे पार करना दुष्कर होता है, उसी प्रकार इस आध्यात्मिक मार्ग को भी ज्ञानीजन अत्यंत दुर्गम और कठिन बताते हैं।

यह श्लोक मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप से अवगत कराता है। अधिकांश मनुष्य संसार के प्रपंचों, मोह-माया, राग-द्वेष और भौतिक सुखों में अंधी नींद सोए हुए हैं। आचार्य या सदगुरु वही है जो इस निद्रा को तोड़े। उपनिषद का संदेश स्पष्ट है कि केवल इच्छा करने से कुछ नहीं मिलता, बल्कि तीव्र पुरुषार्थ, गुरु भक्ति और विवेक की तलवार से इस जीवन पथ की कठिनाइयों को पार करना पड़ता है।

शास्त्रीय एवं पौराणिक संदर्भ

यह अनुपम उपदेश कृष्ण यजुर्वेद के कठोपनिषद के प्रथम अध्याय की तीसरी वल्ली का चौदहवां (1.3.14) श्लोक है। इसके वक्ता स्वयं धर्मराज यम (यमराज) हैं और श्रोता परम जिज्ञासु बाल ब्रह्मचारी नचिकेता हैं। नचिकेता अपने पिता वाजश्रवा द्वारा यमलोक भेजे जाने पर यमराज से ब्रह्मविद्या का वरदान मांगते हैं। यमराज नचिकेता की परीक्षा लेते हैं, उन्हें प्रलोभन देते हैं, किंतु नचिकेता जब नश्वर भोगों को ठुकराकर केवल श्रेष्य (कल्याणकारी मार्ग) को चुनते हैं, तब यमराज उन्हें यह परम आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करते हैं। यह प्रसंग सनातन संस्कृति में गुरु-शिष्य परंपरा का सर्वोच्च आदर्श प्रस्तुत करता है।

दार्शनिक एवं आध्यात्मिक महत्व

कठोपनिषद का यह मंत्र वेदांत दर्शन का सार है। इसमें 'श्रेय' (कल्याणकारी मार्ग) और 'प्रेय' (प्रिय लगने वाला मार्ग) का भेद समझाया गया है। 'उत्तिष्ठत' (उठो) का अर्थ है शारीरिक और मानसिक आलस्य का त्याग। 'जाग्रत' (जागो) का अर्थ है आंतरिक चेतना और बौद्धिक विवेक का जागरण। 'प्राप्य वरान्निबोधत' का अर्थ है योग्य और ब्रह्मवेत्ता गुरु की शरण में जाकर सत्य का बोध करना।

भारतीय दर्शन के अनुसार, अज्ञान ही समस्त दुखों का मूल है। जब तक मनुष्य माया के आवरण से ढंका रहता है, वह जन्म-मृत्यु के चक्र में भटकता रहता है। इस श्लोक का दर्शन कर्मयोग, भक्तियोग और ज्ञानयोग तीनों का समन्वय प्रस्तुत करता है। यह हमें सिखाता है कि आध्यात्मिक उन्नति के लिए केवल भाग्य के भरोसे बैठने से काम नहीं चलेगा, बल्कि पुरुषार्थ की पराकाष्ठा करनी होगी।

दैनिक जीवन में व्यावहारिक उपयोग

विद्यार्थियों के लिए

छात्र जीवन में आलस्य सबसे बड़ा शत्रु है। 'उत्तिष्ठत जाग्रत' का संदेश विद्यार्थियों को सुबह जल्दी उठकर, एकाग्रचित्त होकर अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कठोर परिश्रम करने की प्रेरणा देता है।

पेशेवरों के लिए

कर्मक्षेत्र में कार्यकुशलता, ईमानदारी और चुनौतियों का डटकर सामना करने के लिए यह श्लोक मानसिक दृढ़ता प्रदान करता है। कठिन परिस्थितियों में भी घबराए बिना आगे बढ़ने का साहस इससे मिलता है।

मानसिक शांति व तनाव मुक्ति

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में मानसिक तनाव आम बात है। यह श्लोक आंतरिक शक्ति को जागृत कर अवसाद और हीनभावना को दूर भगाता है तथा जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करता है।

परिवार व समाज के लिए

समाज में नैतिक मूल्यों की स्थापना और सामूहिक उत्थान के लिए प्रबुद्ध जनों का कर्तव्य है कि वे अज्ञान रूपी अंधकार को दूर करने के लिए समाज को सही दिशा दिखाएं।

साधना, पाठ विधि एवं शुभ मुहूर्त

इस महावाक्य का पाठ और मनन ब्रह्ममुहूर्त (प्रातः 4:00 से 5:30 बजे के बीच) में करना सर्वाधिक फलदायी माना गया है। शांत चित्त होकर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके आसन पर बैठें। इस श्लोक का प्रतिदिन कम से कम 108 बार (एक माला) जप या स्मरण करने से मानसिक एकाग्रता, आत्मबल और बौद्धिक तीक्ष्णता में अद्भुत वृद्धि होती है। इसके नियमित पाठ से जीवन की सभी बाधाएं दूर होती हैं और साधक में नेतृत्व क्षमता व निर्भीकता का विकास होता है।

कठोपनिषद के तृतीय अध्याय का ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य

कठोपनिषद भारतीय सनातन दर्शन का एक ऐसा पावन ग्रंथ है जो हमें जीवन, मृत्यु और उससे भी परे की शाश्वत सत्य की यात्रा पर ले जाता है। कृष्ण यजुर्वेद से संबद्ध यह उपनिषद आचार्य यम और नचिकेता के बीच हुए उस अत्यंत गूढ़ संवाद का दस्तावेज़ है, जिसमें बालक नचिकेता ने संसार के समस्त भोगों और ऐश्वर्यों को तृण के समान ठुकराकर केवल आत्मज्ञान और ब्रह्मविद्या को चुना था। उपनिषद के इस तृतीय अध्याय में आचार्य यम मानव जीवन की उस परम स्थिति का वर्णन करते हैं, जहाँ जीव अपनी अज्ञानता की दीर्घ निद्रा से जागकर अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान सकता है। यह संवाद केवल दो व्यक्तियों के बीच का सामान्य संवाद नहीं है, बल्कि यह हर उस मुमुक्षु (मोक्ष की इच्छा रखने वाले) के लिए एक महामंत्र है जो भवसागर से पार उतरना चाहता है।

इस अध्याय में यमराज रथ रूपक (रथ-कल्पना) के माध्यम से आत्मा, शरीर, इंद्रियों और मन के संबंधों को अत्यंत स्पष्ट रूप से समझाते हैं। शरीर को रथ, आत्मा को उसका स्वामी (रथी), बुद्धि को सारथी, मन को लगाम और इंद्रियों को घोड़ा बताया गया है। जो मनुष्य विवेकहीन और असंयमी होता है, उसकी इंद्रियां उसके कुमार्गगामी घोड़ों की तरह उसे अज्ञान के अंधकार में धकेल देती हैं। इसके विपरीत, जिस व्यक्ति की बुद्धि रूपी सारथी प्रज्ञावान और संयमी होती है, उसका मन रूपी लगाम वश में रहता है और वह अपने गंतव्य यानी परम पद को प्राप्त कर लेता है। इसी गंभीर वैचारिक पृष्ठभूमि में भगवान यमराज साधक को संबोधित करते हुए उस महामंत्र का उच्चारण करते हैं जो मानव चेतना को झकझोर कर रख देता है।

महामृत्यु के देवता कहे जाने वाले यमराज द्वारा दिया गया यह उपदेश इस बात का प्रतीक है कि मृत्यु केवल शरीर का अंत नहीं है, बल्कि यह जीवन के सत्य को समझने का एक अवसर भी है। यमराज नचिकेता के माध्यम से समस्त मानव जाति को यह चेतावनी देते हैं कि यह दुर्लभ मनुष्य योनि केवल खाने, सोने और भोग विलास करने के लिए नहीं मिली है। यह जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति पाने का एक स्वर्णिम द्वार है। जब तक मनुष्य अज्ञान रूपी रात्रि में सोता रहता है, तब तक उसके जीवन का वास्तविक उद्देश्य छुपा रहता है। अतः इस अध्याय का प्रत्येक श्लोक साधक के भीतर वैराग्य, जागृति और आत्म-अनुशासन की तीव्र अग्नि प्रज्वलित करने का सामर्थ्य रखता है।

उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत। क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति॥ - कठोपनिषद 1.3.14

उत्तिष्ठत जाग्रत: उठो, जागो और आलस्य का त्याग करो

कठोपनिषद के इस प्रसिद्ध श्लोक के प्रथम चरण 'उत्तिष्ठत जाग्रत' का आह्वान आध्यात्मिक साधना का मूल आधारस्तंभ है। यहाँ 'उठने' का तात्पर्य केवल शारीरिक रूप से बिस्तर से उठना नहीं है, बल्कि उस मानसिक और आध्यात्मिक जड़ता से बाहर आना है जहाँ जीव अपने को केवल यह नश्वर शरीर मान बैठता है। सांसारिक मोह-माया, सुख-सुविधाओं और अहंकार में लिप्त मनुष्य अज्ञान की गहरी नींद में सो रहा होता है। आचार्य यम आदेश देते हैं कि हे मनुष्यों! अब और अधिक समय नष्ट मत करो, अपनी इस सुप्त अवस्था को तोड़ो और अपनी सोई हुई चेतना को जागृत करो। भौतिक प्रगति की दौड़ में भागते-भागते जब मनुष्य अपनी आत्मिक पहचान भूल जाता है, तब यह महावाक्य उसे उसकी मूल ऊर्जा का स्मरण कराता है।

जागृति का यह मार्ग अत्यंत तीखा और सजगता की मांग करने वाला है। श्लोक के उत्तरार्ध में यमराज कहते हैं कि यह मार्ग 'क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया' अर्थात उस्तरे की तेज धार के समान अत्यंत कठिन और संकीर्ण है। जिस प्रकार उस्तरे की धार पर चलना बेहद जोखिम भरा होता है, जरा सा भी ध्यान भटकने पर रक्तपात हो जाता है, ठीक उसी प्रकार आत्मज्ञान का मार्ग भी जरा सी असावधानी से पतन का कारण बन सकता है। यहाँ क्रोध, काम, लोभ, मोह और अहंकार जैसी मानसिक वृत्तियाँ पग-पग पर बाधा बनकर खड़ी रहती हैं। इसलिए साधक को हर पल सजग रहना पड़ता है ताकि वह माया के प्रलोभनों में न फंसे और अपने लक्ष्य के प्रति पूरी तरह एकाग्रचित्त रहे।

यह जागृति केवल बौद्धिक स्तर पर नहीं होती, बल्कि यह जीव के भीतर एक आंतरिक क्रांति है। जब मनुष्य भीतर से जागता है, तब उसे संसार की नश्वरता और आत्मा की अमरता का भेद समझ में आने लगता है। वह समझ जाता है कि जो कुछ भी आँखों से दिखाई दे रहा है, वह सब परिवर्तनशील और विसर्जनशील है। इस जागृति के बाद सांसारिक दुखों के आघात व्यक्ति को विचलित नहीं कर पाते क्योंकि उसकी दृष्टि नश्वर शरीर से हटकर उस अविनाशी ब्रह्म पर टिक जाती है। यही कारण है कि भारतीय मनीषियों और संतों ने हमेशा 'जागृत भव' का संदेश दिया है, ताकि मनुष्य जीवन के वास्तविक मूल्य को पहचान सके और व्यर्थ की प्रपंचों में अपना समय न गंवाए।

आध्यात्मिक चरणसांसारिक स्थिति (अज्ञान)कठोपनिषद का संदेश (ज्ञान)
चेतना स्तरभोग-विलास और मोह में प्रसुप्त (सोया हुआ)उत्तिष्ठत (उठो) - चेतना को जाग्रत करना
लक्ष्य बोधमात्र भौतिक सुखों को परम सत्य माननाजाग्रत (जागो) - आत्मिक स्वरूप को पहचानना
मार्गदर्शनस्वयं के अहंकार और मन के अधीन होनाप्राप्य वरान्निबोधत (श्रेष्ठ गुरु का सान्निध्य)

प्राप्य वरान्निबोधत: श्रेष्ठ महापुरुषों और गुरुओं के सान्निध्य में ज्ञान प्राप्ति

श्लोक के अगले भाग 'प्राप्य वरान्निबोधत' में आचार्य यम अत्यंत महत्वपूर्ण और व्यावहारिक सत्य का उद्घाटन करते हैं। वे कहते हैं कि केवल उठने और जागने से ही काम नहीं चलेगा, बल्कि इसके आगे का चरण है—श्रेष्ठ महापुरुषों, आचार्यों और ब्रह्मवेत्ता गुरुओं की शरण में जाना और उनसे उस परम ज्ञान को भली-भांति समझना। 'वरान्निबोधत' का शाब्दिक अर्थ है कि श्रेष्ठ वर (गुरु या ज्ञानी महापुरुष) को प्राप्त करके उस ब्रह्मविद्या का बोध प्राप्त करो। सनातन संस्कृति में स्व-अध्ययन का महत्व अपनी जगह है, किंतु बिना प्रामाणिक गुरु के मार्गदर्शन के सूक्ष्म आध्यात्मिक रहस्यों को समझना असंभव सा माना गया है।

अध्यात्म का मार्ग इतना सूक्ष्म और जटिल है कि बुद्धि के अहंकार में डूबा हुआ व्यक्ति अक्सर भ्रमित हो जाता है। जब तक जीवन में किसी ऐसे पूर्ण संत या गुरु का सान्निध्य नहीं मिलता, जिसने उस सत्य को स्वयं अनुभव किया हो, तब तक शास्त्रों के शब्द कोरे सिद्धांत बने रहते हैं। गुरु वह प्रकाशस्तंभ है जो साधना के मार्ग में आने वाले अंधकार, भ्रम और बाधाओं को अपनी करुणा और दिव्य दृष्टि से दूर कर देता है। इसलिए यमराज नचिकेता को यह निर्देश देते हैं कि ज्ञान प्राप्ति के लिए अहंकार का त्याग करके किसी योग्य और ब्रह्मनिष्ठ महापुरुष के पास जाना चाहिए, उनसे विनम्र भाव से प्रश्न पूछने चाहिए और उनकी सेवा व उपदेशों के माध्यम से अपने भीतर ज्ञान का दीप प्रज्वलित करना चाहिए।

इस प्रकार, कठोपनिषद का यह मंत्र आज के आधुनिक और व्यस्त युग में भी उतना ही प्रासंगिक है जितना कि वैदिक काल में था। आज का मनुष्य तनाव, अवसाद और आंतरिक अशांति से घिरा हुआ है क्योंकि वह अपनी मूल जड़ों और आध्यात्मिक चेतना से कट चुका है। यदि हम अपने जीवन को सार्थक बनाना चाहते हैं, जन्म और मरण के इस चक्र से मुक्ति पाना चाहते हैं, तो हमें भी इस महामंत्र को अपने जीवन का ध्येय बनाना होगा—उठना होगा, अज्ञान की नींद से जागना होगा और किसी सच्चे गुरु के चरणों में बैठकर उस परम ज्ञान को आत्मसात करना होगा। यही मानव जीवन की सबसे बड़ी सफलता और परम पुरुषार्थ है।

संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 02 Nov 2026

पाठकों के विचार (0)

भक्ति रस चर्चा में भाग लें

लिरिक्स कॉपी कर लिया गया है!
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!