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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 66: मोक्ष का परम रहस्य

श्रीमद्भगवद्गीता के 18वें अध्याय के 66वें श्लोक का संपूर्ण अर्थ, व्याख्या और महत्व। जानें कैसे भगवान श्रीकृष्ण ने शरणागति को मोक्ष का मार्ग बताया है। Read complete 2026/11/bhagavad Gita Chapter 18 Verse 66 Moksha Sannyasa Yoga.html with Sanskrit meaning & spiritual significance in Hindi.

श्रीमद्भगवद्गीता का अठारहवां अध्याय 'मोक्ष संन्यास योग' के नाम से विख्यात है। यह अध्याय न केवल गीता का समापन है, बल्कि समस्त वेदों, उपनिषदों और शास्त्रों का निचोड़ है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को वह परम गुह्य ज्ञान प्रदान किया है, जिसे समझकर मनुष्य जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है। श्लोक 66 इस अध्याय का हृदय है, जो शरणागति के सिद्धांत को सर्वोच्च स्थान देता है।

मूल संस्कृत श्लोक

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥

पदच्छेद एवं अन्वय

पदच्छेद: सर्व-धर्मान्, परित्यज्य, माम्, एकम्, शरणम्, व्रज, अहम्, त्वा, सर्व-पापेभ्यः, मोक्षयिष्यामि, मा, शुचः।

अन्वय: (हे अर्जुन!) सर्वधर्मान् परित्यज्य माम् एकम् शरणम् व्रज। अहम् त्वा सर्वपापेभ्यः मोक्षयिष्यामि, मा शुचः।

शब्दार्थ

संस्कृत पदव्याकरण / पदच्छेदसरल हिंदी अर्थEnglish Meaning
सर्वधर्मान्द्वितीया बहुवचनसभी धर्मों को (कर्तव्य कर्मों को)All varieties of religion/duties
परित्यज्यल्यबन्त अव्ययत्याग करकेHaving abandoned
माम्अस्मद् सर्वनाममेरी (भगवान की)Unto Me
एकम्विशेषणएकमात्रOnly/Solely
शरणम्संज्ञाशरणSurrender
व्रजलोट् लकारआओ/जाओTake shelter
अहम्कर्तामैंI
त्वायुष्मद् सर्वनामतुम्हेंYou
सर्वपापेभ्यःपंचमी बहुवचनसभी पापों सेFrom all sinful reactions
मोक्षयिष्यामिभविष्यत् कालमुक्त कर दूँगाShall deliver/liberate
मा शुचःनिषेधवाचकशोक मत करोDo not grieve

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समस्त लौकिक और वैदिक धर्मों (कर्तव्यों) के अहंकार को त्यागकर केवल अपनी शरणागति स्वीकार करने का आदेश देते हैं। 'सर्वधर्मान् परित्यज्य' का अर्थ यह नहीं है कि मनुष्य अपने कर्तव्यों का पालन करना छोड़ दे, बल्कि इसका अर्थ है कि उन कर्तव्यों के फल और कर्तापन के अभिमान का त्याग कर दे। जब मनुष्य यह समझ लेता है कि वह स्वयं कुछ नहीं कर रहा, बल्कि सब कुछ परमात्मा की इच्छा से हो रहा है, तब वह वास्तविक शरणागति को प्राप्त होता है। भगवान का आश्वासन है कि जो पूर्णतः मुझमें स्थित हो जाता है, उसके समस्त पापों का नाश मैं स्वयं करता हूँ। यह 'शरणागति योग' है, जो भक्ति का सर्वोच्च शिखर है।

शास्त्रीय एवं पौराणिक संदर्भ

यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के 18वें अध्याय का 66वां श्लोक है। कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि में जब अर्जुन मोहग्रस्त होकर गांडीव त्याग देते हैं, तब श्रीकृष्ण उन्हें जीवन के अंतिम सत्य का बोध कराते हैं। यह श्लोक 'चरम श्लोक' कहलाता है। वैष्णव संप्रदायों में इसे 'द्वय मन्त्र' के समान पवित्र माना जाता है। यह उपदेश न केवल अर्जुन के लिए था, बल्कि समस्त मानव जाति के लिए एक शाश्वत मार्गदर्शक है।

दार्शनिक एवं आध्यात्मिक महत्व

दार्शनिक दृष्टि से यह श्लोक 'अहंकार' के विनाश की बात करता है। 'सर्वधर्मान्' का अर्थ है वर्ण, आश्रम, और लौकिक नियमों का बंधन। जब तक हम नियमों के जाल में उलझे रहते हैं, तब तक हम 'मैं' और 'मेरा' के भाव से मुक्त नहीं हो पाते। शरणागति का अर्थ है 'आत्म-समर्पण'। यह कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग का संगम है। भगवान यहाँ 'मा शुचः' कहकर भक्त को अभयदान देते हैं। यह विश्वास दिलाना कि 'मैं तुम्हें मुक्त करूँगा', ईश्वर की असीम करुणा का प्रमाण है।

दैनिक जीवन में व्यावहारिक उपयोग

विद्यार्थियों के लिए: परीक्षा के तनाव को त्यागकर अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास करें और परिणाम ईश्वर पर छोड़ दें।
पेशेवरों के लिए: कार्यस्थल पर निष्काम भाव से कार्य करें, सफलता-असफलता के द्वंद्व से ऊपर उठें।
मानसिक शांति: चिंता और अवसाद से मुक्ति का एकमात्र उपाय है ईश्वर पर अटूट विश्वास।
परिवार व समाज: अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए भी मन को परमात्मा में लगाए रखें।

साधना, पाठ विधि एवं शुभ मुहूर्त

इस श्लोक का पाठ प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान के बाद करना चाहिए। इसे गीता के 18वें अध्याय के साथ पढ़ना अत्यंत फलदायी है। एकादशी, जन्माष्टमी, या किसी भी शुभ तिथि पर इसका 108 बार जप करने से मन की शुद्धि होती है। पाठ करते समय भगवान श्रीकृष्ण के विग्रह या चित्र के सामने दीपक जलाएं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

  • प्रश्न: क्या इसका अर्थ है कि हमें अपने कर्तव्य छोड़ देने चाहिए?
    उत्तर: नहीं, इसका अर्थ है कि कर्तव्यों के फल की आसक्ति और कर्तापन के अहंकार को छोड़ना है।
  • प्रश्न: 'सर्वधर्मान्' का वास्तविक अर्थ क्या है?
    उत्तर: यहाँ धर्म का अर्थ है वे सांसारिक और वैदिक नियम जो हमें संसार से बांधते हैं।
  • प्रश्न: क्या यह श्लोक केवल अर्जुन के लिए था?
    उत्तर: नहीं, यह समस्त मानव जाति के लिए है जो संसार के दुखों से मुक्ति चाहती है।
  • प्रश्न: 'मा शुचः' का क्या महत्व है?
    उत्तर: यह भगवान का भक्त को दिया गया सबसे बड़ा आश्वासन है कि वे हर परिस्थिति में भक्त की रक्षा करते हैं।

श्रीमद्भगवद्गीता अष्टादश अध्याय: मोक्ष-संन्यास योग का दार्शनिक और आध्यात्मिक सार

श्रीमद्भगवद्गीता का अठारहवां अध्याय, जिसे 'मोक्ष-संन्यास योग' के नाम से जाना जाता है, संपूर्ण गीता का उपसंहार और सार-तत्व है। यह अध्याय केवल एक उपदेश नहीं, बल्कि भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया वह अंतिम निर्देश है जो जीव को जन्म-मरण के चक्र से मुक्त करने का मार्ग प्रशस्त करता है। इस अध्याय में भगवान ने त्याग (संन्यास) और कर्मयोग के बीच के सूक्ष्म अंतर को स्पष्ट करते हुए यह स्थापित किया है कि वास्तविक संन्यास कर्मों का परित्याग नहीं, बल्कि कर्मफल की आसक्ति का परित्याग है। यहाँ श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि जो व्यक्ति अपने नियत कर्मों को ईश्वरार्पण बुद्धि से करता है, वह स्वतः ही संन्यासी है।

इस अध्याय का आध्यात्मिक विज्ञान 'त्रिगुणात्मक प्रकृति' के विश्लेषण पर आधारित है। भगवान श्रीकृष्ण ने सात्विक, राजसिक और तामसिक कर्मों, कर्ताओं, बुद्धि, धृति और सुख का विस्तृत वर्गीकरण किया है। यह वर्गीकरण साधक को यह समझने में सहायता करता है कि वह किस मानसिक धरातल पर स्थित है। जब साधक अपनी बुद्धि को सात्विक स्तर पर ले जाता है, तब वह अहंकार से मुक्त होकर परमात्मा के प्रति पूर्णतः समर्पित हो जाता है। यही वह बिंदु है जहाँ से मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। अठारहवां अध्याय हमें सिखाता है कि आध्यात्मिक उन्नति के लिए केवल शास्त्रों का अध्ययन पर्याप्त नहीं है, बल्कि जीवन के प्रत्येक क्षण में 'योगस्थ' होकर कर्म करना अनिवार्य है।

मोक्ष-संन्यास योग का अंतिम संदेश 'शरणागति' है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि सभी धर्मों (कर्तव्यों) का परित्याग करके केवल मेरी शरण में आओ। यह कोई पलायनवाद नहीं है, बल्कि यह अहंकार का पूर्ण विसर्जन है। जब जीव यह स्वीकार कर लेता है कि वह स्वयं कर्ता नहीं है, बल्कि ईश्वर की इच्छा का एक माध्यम मात्र है, तब वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है। यह अध्याय हमें यह बोध कराता है कि भक्ति और ज्ञान का मिलन ही मोक्ष का एकमात्र द्वार है। जो व्यक्ति इस अध्याय के गूढ़ रहस्यों को समझ लेता है, वह संसार के द्वंद्वों से ऊपर उठकर परम शांति को प्राप्त करता है।

कर्म, त्याग और संन्यास का सूक्ष्म विश्लेषण

अठारहवें अध्याय के प्रारंभ में अर्जुन 'त्याग' (त्याग) और 'संन्यास' (संन्यास) के बीच का अंतर जानना चाहते हैं। भगवान श्रीकृष्ण इसका उत्तर देते हुए कहते हैं कि काम्य कर्मों का परित्याग करना 'संन्यास' है और सभी कर्मों के फलों का त्याग करना 'त्याग' है। यहाँ भगवान स्पष्ट करते हैं कि यज्ञ, दान और तप जैसे कर्मों का कभी भी परित्याग नहीं करना चाहिए, क्योंकि ये कर्म बुद्धि को शुद्ध करने वाले हैं। जो व्यक्ति इन कर्मों को आसक्ति और फल की इच्छा से रहित होकर करता है, वही वास्तव में त्यागी है। यह शिक्षा आधुनिक युग के लिए अत्यंत प्रासंगिक है, जहाँ व्यक्ति कर्म के बोझ से दबकर तनावग्रस्त हो जाता है।

भगवान ने कर्म के पांच कारणों का वर्णन किया है: अधिष्ठान (शरीर), कर्ता, विभिन्न प्रकार के करण (इंद्रियां), विविध प्रकार की चेष्टाएं और पांचवां दैव (ईश्वर)। जो व्यक्ति यह समझता है कि कर्म की सिद्धि में केवल उसका अहंकार ही नहीं, बल्कि ये पांचों तत्व सम्मिलित हैं, वह कभी भी अहंकार से ग्रसित नहीं होता। जो स्वयं को ही एकमात्र कर्ता मानता है, उसकी बुद्धि दूषित होती है। अतः, निष्काम कर्मयोग का अर्थ है—अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए यह बोध रखना कि कर्तापन का भाव ईश्वर में निहित है।

सात्विक, राजसिक और तामसिक कर्मों का वर्गीकरण साधक के लिए एक दर्पण के समान है। सात्विक कर्म वह है जो शास्त्रविहित हो, आसक्ति रहित हो और फल की इच्छा के बिना किया गया हो। राजसिक कर्म वह है जो बहुत परिश्रम से, अहंकार के साथ और फल की इच्छा से किया जाता है। तामसिक कर्म वह है जो मोहवश, परिणामों की परवाह किए बिना और दूसरों को कष्ट पहुँचाने वाला होता है। इस अध्याय का अध्ययन हमें अपने दैनिक जीवन के कार्यों को सात्विक बनाने की प्रेरणा देता है, जिससे चित्त की शुद्धि हो सके और अंततः मोक्ष का मार्ग प्रशस्त हो सके।

अष्टादश अध्याय के श्लोकों का आध्यात्मिक प्रभाव और विधि

श्रीमद्भगवद्गीता का अठारहवां अध्याय स्वयं में एक महामंत्र है। इसके अंतिम श्लोक, जहाँ संजय कहते हैं कि 'जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और जहाँ धनुर्धर अर्जुन हैं, वहीं श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है', इस बात का प्रमाण है कि यह अध्याय सफलता और कल्याण का आधार है। इस अध्याय का नित्य पाठ करने से साधक के भीतर सात्विक बुद्धि का उदय होता है। इसे पढ़ने की विधि अत्यंत सरल है, किंतु इसे पूर्ण श्रद्धा और एकाग्रता के साथ करना चाहिए। पाठ से पूर्व भगवान श्रीकृष्ण के स्वरूप का ध्यान करना और मन को सांसारिक चिंताओं से मुक्त करना आवश्यक है।

विषय सात्विक गुण (मोक्ष हेतु) राजसिक गुण (बंधन हेतु) तामसिक गुण (पतन हेतु)
कर्म कर्तव्य समझकर करना फल की इच्छा से करना मोह और प्रमाद से करना
बुद्धि धर्म-अधर्म का विवेक भ्रमित और चंचल अधर्म को धर्म मानना
सुख आरंभ में विष, अंत में अमृत आरंभ में अमृत, अंत में विष निद्रा, आलस्य और प्रमाद
धृति (धैर्य) योग से मन को थामना धर्म-अर्थ-काम में आसक्ति भय, शोक और विषाद

इस अध्याय के पाठ का फल केवल भौतिक सुख नहीं, बल्कि आत्म-साक्षात्कार है। जो साधक प्रतिदिन इस अध्याय का पारायण करता है, उसके भीतर के तामसिक और राजसिक दोष धीरे-धीरे क्षीण होने लगते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा है कि जो इस परम गोपनीय शास्त्र का अध्ययन करता है, वह मेरे द्वारा ज्ञान-यज्ञ से पूजित होता है। यह अध्याय हमें सिखाता है कि जीवन का अंतिम लक्ष्य केवल धनार्जन या सांसारिक प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि 'मोक्ष' है—अर्थात अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानना और परमात्मा में लीन हो जाना।

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥
अर्थात्: सभी धर्मों (कर्तव्यों) का त्याग कर, तू केवल मेरी शरण में आ। मैं तुझे समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा, तू शोक मत कर। यही इस अध्याय और संपूर्ण गीता का सार है—पूर्ण शरणागति ही मोक्ष का एकमात्र मार्ग है।

अंत में, अठारहवां अध्याय हमें एक योद्धा की तरह जीवन जीने की प्रेरणा देता है। अर्जुन की तरह हमें भी अपने जीवन के कुरुक्षेत्र में मोह और विषाद का त्याग करके अपने नियत कर्मों को ईश्वर की सेवा मानकर करना चाहिए। जब हम अपने कर्मों को 'यज्ञ' बना लेते हैं, तब संसार का कोई भी बंधन हमें बांध नहीं सकता। यही मोक्ष-संन्यास योग की पराकाष्ठा है। इस अध्याय का निरंतर चिंतन हमें उस स्थिति तक ले जाता है जहाँ हम 'स्थितप्रज्ञ' होकर जीवन के सुख-दुख, लाभ-हानि और जय-पराजय से ऊपर उठ जाते हैं।

संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 04 Nov 2026

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