भक्ति काव्य व भजन मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

श्री यमु्राष्टकम् - सम्पूर्ण मूल पाठ, हिंदी अर्थ, लाभ एवं पाठ विधि

महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य रचित श्री यमु्राष्टकम् का सम्पूर्ण मूल संस्कृत पाठ, सरल हिंदी भावार्थ, शास्त्रीय पाठ विधि, आध्यात्मिक रहस्य एवं दिव्य फलश्रुति।

श्री यमु्राष्टकम् - आध्यात्मिक परिचय एवं पौराणिक पृष्ठभूमि

पुष्टिमागिीय परंपरा एवं वैष्णव संस्कृति में श्री यमु्राष्टकम् (Sri Yamunashtakam) का स्थान परम अलौकिक, सर्वोत्कृष्ट एवं दिव्य माना गया है। यह परम पवित्र अष्टक स्तोत्र शुद्धाद्वैत दर्शन के संस्थापक, जगद्गुरु श्रीमद् वल्लभाचार्य महाप्रभु जी द्वारा विरचित है। वैष्णव संप्रदाय, विशेषकर पुष्टि संप्रदाय में, श्री यमु्राष्टकम् केवल एक स्तोत्र नहीं, अपितु भगवद्-रस में प्रवेश करने का प्रथम द्वार और माँ यमुना जी की अनन्य अनुकंपा प्राप्त करने का सिद्ध महामंत्र है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, श्री यमुना जी केवल एक भौतिक नदी या जलधारा नहीं हैं, अपितु वे साक्षात् सच्चिदानंदमयी भगवद्-स्वरूपा हैं। वे सूर्यदेव की परम पावन पुत्री, यमराज की स्नेहमयी भगिनी (बहन), और भगवान श्री निकुंजनायक श्री कृष्ण की चतुर्थ पटरानी (कालिंदी) हैं। ब्रजमंडल में यमुना जी को 'स्वामिनी जी' (श्री राधिका जी) का ही काय-व्यूह रूप माना गया है, जो भक्तों पर श्री कृष्ण के अनन्य प्रेम का दान करती हैं।

जब श्रीमद् वल्लभाचार्य महाप्रभु जी अपने प्रथम भारत-भ्रमण के समय ब्रजभूमि में पधारे और गोकुल के गोकुलनाथ घाट (ठाकुरानी घाट) पर विश्राम कर रहे थे, तब उन्हें श्री यमुना जी के प्रत्यक्ष अलौकिक स्वरूप के दर्शन हुए। माँ यमुना जी के उस अत्यंत सुहावने, त्रिभंगी और कारुणिक स्वरूप को देखकर महाप्रभु जी के हृदय से स्वतः ही संस्कृत पद्यमयी दिव्य स्तुति फूट पड़ी, जिसे आज हम 'श्री यमु्राष्टकम्' के नाम से जानते हैं।

इस स्तोत्र की विशेषता यह है कि यह साधक के चित्त से भौतिक विकारों और यमराज के भय को समाप्त कर उसमें केवल और केवल भगवान श्री कृष्ण के प्रति अनन्य दास्य एवं कांता-भाव की भक्ति जागृत करता है। जो भक्त प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक श्री यमु्राष्टकम् का पाठ करते हैं, उनके समस्त संताप, पाप एवं संसार-ताप स्वतः भस्म हो जाते हैं।

श्री यमु्राष्टकम् - सम्पूर्ण प्रामाणिक मूल पाठ

नीचे श्रीमद् वल्लभाचार्य महाप्रभु रचित श्री यमु्राष्टकम् का शत-प्रतिशत प्रामाणिक, शुद्ध एवं सम्पूर्ण मूल संस्कृत पाठ देवनागरी लिपि में प्रस्तुत किया जा रहा है:

॥ श्री यमु्राष्टकम् ॥

नमामि यमुनामहं सकलसिद्धिहेतुं मुदा
मुरारिपदपंकजस्फुरदमन्दरेणुउत्कटाम्।
तटस्थनवकाननप्रकटमोदपुष्पाम्बुना
सुरासुरसुपूजितप्रचुरपूरपापोद्धराम् ॥ १ ॥

मुरारिकायकालियाप्रभाटिकान्तिभासुरै-
र्विराजितकलिन्दजागिरिमयूरदीप्ताननैः।
दिशां दधातु मे मतिं तदीयहेतुचारुणा
तटद्वयसुरद्रुमैर्विकचपुष्पधूल्युत्कटैः ॥ २ ॥

तटान्तवालुकासुलुपक्वपंकजातिसौरभ-
स्फुरन्मकरन्दमोहितमत्तभृङ्गकूजितैः।
कृतप्रभूतसङ्गमप्रचुरपुण्यसौरभैः
समन्वितकलिन्दजा मुदेऽस्तु मे सदा सुखा ॥ ३ ॥

तुदन्तमिह संसारे निकाममुन्मदात्मानम्
सुतासुहृदादिषु प्रचुरपुत्रमित्रैर्वृतम्।
मयापि न विमूर्च्छिता भवतु यन्मतिः कामतो
भवेद्वपुरमुष्य ते सततपादपद्मे रतः ॥ ४ ॥

नमोऽस्तु तेऽस्तु सर्वदेवनन्दिताङ्घ्रिपंकजे
ममस्तु मुदमावहन्त्यनिशमच्युतप्रिये।
न देवपतिरूपिणि न च विरिञ्चिभूपक्षये
न जातु मम सम्भवो भवतु देवभूर्तेस्तव ॥ ५ ॥

नमाम्युपेन्द्रकन्यके त्वमग्रजा मरुद्विधौ
सुता नताङ्घ्रिपंकजे भवस्य सर्वदेहिनाम्।
तवैव पादपंकजं विहाय नैव जायते
कदाचिदपि मे मतिः क्वचिदपि स्मरेद् धिया ॥ ६ ॥

नमामि कृष्णसोदरीं सुरेन्द्रवृन्दवन्दितां
नवेन नूतनाम्बरेण भूषितां सुशोभिताम्।
तवाम्बुबिन्दुभिः समं समैति भक्तिरुत्तमा
हरौ मनो विमुच्यते न जातु पापसञ्चयात् ॥ ७ ॥

तवाम्बुपानतो जनो न याति यमयातनां
न चापि तस्य जायते पुनर्भवादिजं भयम्।
सदा भवतु मे मनस्तव सुपादरूपे रतम्
नमामि कलिन्दात्मजे निरन्तरं सुपुण्यदे ॥ ८ ॥

॥ फलश्रुति / समर्पण ॥
इति श्रीमद्वल्लभाचार्यविरचितं श्री यमु्राष्टकं संपूर्णम्।
॥ श्री कृष्णार्पणमस्तु ॥

प्रत्येक श्लोक का सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक रहस्य

श्री यमु्राष्टकम् के प्रत्येक श्लोक में भक्ति रस का सागर समाहित है। साधकों की सुगमता एवं आध्यात्मिक बोध हेतु प्रत्येक श्लोक का विशद हिंदी अर्थ एवं गूढ़ रहस्य नीचे दिया गया है:

प्रथम श्लोक: सर्वसिद्धिदात्री एवं पापविनाशिनी स्वरूप

श्लोक: नमामि यमुनामहं सकलसिद्धिहेतुं मुदा... ॥ १ ॥

हिंदी अर्थ: मैं (वल्लभ) समस्त आध्यात्मिक एवं भौतिक सिद्धियों की कारणरूपा माँ यमुना जी को प्रसन्नतापूर्वक प्रणाम करता हूँ। आपके तट पर भगवान श्री कृष्ण (मुरारि) के चरण-कमलों की अत्यंत दिव्य एवं अत्यधिक रज (धूलि) सुशोभित हो रही है। आपके दोनों तटों पर स्थित नवीन सघन वनों के विकसित एवं सुगंधित पुष्पों से युक्त जलधारा बह रही है। देवों एवं असुरों द्वारा पूजित आपकी विशाल जलधारा अपने शरण में आने वाले जीवों के समस्त महापापों का समूल नाश करने वाली है।

गूढ़ रहस्य: इस श्लोक में महाप्रभु जी बताते हैं कि यमुना जी केवल जलधारा नहीं, बल्कि श्री कृष्ण के चरणों की रज को धारण करने वाली परम चेतना हैं। जब जीव यमुना जल का स्पर्श करता है, तो उसे श्री कृष्ण चरण-रज की दिव्य अनुभूति होती है।

द्वितीय श्लोक: श्याम कांति एवं नूपुर ध्वनि का सौंदर्य

श्लोक: मुरारिकायकालियाप्रभाटिकान्तिभासुरै-... ॥ २ ॥

हिंदी अर्थ: भगवान मुरारि के श्रीअंगों की श्याम कांति तथा कालिया नाग के मणियों की कांति से जिनका जल अत्यंत देदीप्यमान एवं भास्वर दिखाई देता है; सुमेरु और कलिंद पर्वत पर निवास करने वाले मयूरों के आनंदित मुख की भाँति जो कांतिमान हैं; और जिनके दोनों तटों पर स्थित कल्पवृक्षों के पूर्ण विकसित पुष्पों के पराग कण झड़ते रहते हैं—वे कलिंदपुत्री माँ यमुना मेरी बुद्धि को सदैव भगवान श्री कृष्ण के चरणों के प्रति आकर्षित एवं स्थिर रखें।

गूढ़ रहस्य: यमुना जी के जल का श्याम वर्ण वास्तव में भगवान श्री कृष्ण के श्रीअंगों की परछाई और उनके प्रति अनन्य प्रेम का प्रतीक है। माँ यमुना जीव की मति (बुद्धि) को सांसारिक वासनाओं से मोड़कर श्री कृष्ण की ओर मोड़ देती हैं।

तृतीय श्लोक: मकरंद, भृंग और पावन तट-सौंदर्य

श्लोक: तटान्तवालुकासुलुपक्वपंकजातिसौरभ-... ॥ ३ ॥

हिंदी अर्थ: जिनके सुंदर बालूभरे तटों पर पूर्ण रूप से खिले हुए कमलों की अत्यंत मादक सुगंध फैली रहती है; उस सुगंध और मकरंद (रस) से मोहित होकर मत्त भौंरे निरंतर गुंजन करते रहते हैं; और जो भगवान श्री कृष्ण के साथ हुए अनेक रासरसों के संगम से परम पवित्र एवं सुवासित बनी हुई हैं—वे कलिंद पर्वत की कन्या माँ यमुना मेरे हृदय में सदा-सर्वदा परम सुख और आनंद का संचार करें।

गूढ़ रहस्य: यह श्लोक रासलीला के आध्यात्मिक आनंद की ओर संकेत करता है। यमुना तट की रज और कमल पुष्प श्री कृष्ण के साथ जीवात्मा के नित्य रास-मिलन का प्रतीक हैं।

चतुर्थ श्लोक: सांसारिक मोह-पाश से मुक्ति की प्रार्थना

श्लोक: तुदन्तमिह संसारे निकाममुन्मदात्मानम्... ॥ ४ ॥

हिंदी अर्थ: हे माँ यमुना! इस दुखमयी संसार में पुत्र, मित्र, स्त्री और धन-संपदा के मोह में अंधा होकर मेरा उन्मत्त मन मुझे निरंतर संतापित और पीड़ित करता रहता है। मेरी आपसे यही व्याकुल प्रार्थना है कि आपकी कृपा से मेरी बुद्धि इस सांसारिक आसक्ति में कभी मूर्च्छित न हो, अपितु मेरा यह देह और मन सर्वदा केवल और केवल आपके एवं श्री कृष्ण के श्री चरण-कमलों की सेवा में ही लीन रहे।

गूढ़ रहस्य: यह श्लोक साधक की दैन्य-भावना (शरणागति) को प्रकट करता है। सांसारिक संबंध जीव को बांधते हैं, परंतु यमुना जी की कृपा जीव को भगवद्-सेवा की ओर मोड़ देती है।

पंचम श्लोक: भगवत्कृपा एवं मोक्ष से परे अनन्य भक्ति की याचना

श्लोक: नमोऽस्तु तेऽस्तु सर्वदेवनन्दिताङ्घ्रिपंकजे... ॥ ५ ॥

हिंदी अर्थ: हे अच्युतप्रिये (श्री कृष्ण की प्राणवल्लभे)! आपके चरण-कमलों की वंदना समस्त देवता (ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि) अत्यंत हर्षित होकर करते हैं, आपको मेरा बारंबार नमस्कार है। आप निरंतर मेरे हृदय में आनंद का विस्तार करें। मुझे न तो देवराज इंद्र के लोक (स्वर्ग) की लालसा है, न ही ब्रह्मा जी के सत्यलोक अथवा मोक्ष की इच्छा है। मेरी तो बस यही एक अभिलाषा है कि आपकी दिव्य भूमि और आपके श्रीचरणों में मेरा नित्य निवास बना रहे।

गूढ़ रहस्य: पुष्टि मार्ग में मोक्ष (मुक्ति) को भगवद्-सेवा के सामने तुच्छ माना गया है। साधक स्वर्ग या मोक्ष नहीं, अपितु माँ यमुना के तट पर श्री कृष्ण की सेवा चाहता है।

षष्ठ श्लोक: उपेन्द्रकन्या की पावनता एवं अनन्य चित्तवृत्ति

श्लोक: नमाम्युपेन्द्रकन्यके त्वमग्रजा मरुद्विधौ... ॥ ६ ॥

हिंदी अर्थ: हे उपेन्द्र (वामन/कृष्ण) की प्रिय स्वरूपे! हे पवनदेव और सूर्यदेव की तेजस्विनी पुत्री! आप समस्त देहधारियों के भव-बंधन को काटने वाली और उनके द्वारा वंदित चरण-कमलों वाली हैं। मैं आपको नमन करता हूँ। मेरी बुद्धि कभी भी आपके चरण-कमलों को त्यागकर अन्यत्र कहीं न जाए, और न ही मेरा चित्त आपकी स्मृति के बिना क्षण भर भी कहीं रमे।

गूढ़ रहस्य: यहाँ यमुना जी की सर्व-पापहारिणी शक्ति का वर्णन है। यमुना जी का स्मरण मात्र ही जीव के अज्ञान रूपी अंधकार को मिटा देता है।

सप्तम श्लोक: कृष्ण सोदरी एवं भक्तिमयी जल-बूंदों का प्रभाव

श्लोक: नमामि कृष्णसोदरीं सुरेन्द्रवृन्दवन्दितां... ॥ ७ ॥

हिंदी अर्थ: जो साक्षात् श्री कृष्ण की सहोदरा (समान स्वरूपा) हैं, जिनकी स्तुति देवराज इंद्र आदि देववृंद निरंतर करते हैं, जो नित्य नवीन और अलौकिक नीले वस्त्रों (जलधारा) से परम सुशोभित हैं—ऐसी माँ यमुना को मैं प्रणाम करता हूँ। आपके जल की एक भी पवित्र बूंद का स्पर्श या पान करने से जीव के भीतर भगवान श्री हरि के प्रति उत्तम (उत्कृष्टा) भक्ति का उदय हो जाता है, जिससे पापोद्भव संस्कार हमेशा के लिए नष्ट हो जाते हैं।

गूढ़ रहस्य: यमुना जल का केवल एक बिंदु साधक के भीतर परा-भक्ति (प्रेमभक्ति) का अंकुर प्रस्फुटित कर देता है, जिससे जन्म-जन्मांतरों के पाप भस्म हो जाते हैं।

अष्टम श्लोक: यम-यातना से मुक्ति एवं अभय दान

श्लोक: तवाम्बुपानतो जनो न याति यमयातनां... ॥ ८ ॥

हिंदी अर्थ: हे कलिंदपुत्री! हे सर्वपुण्यप्रदायिनी! आपके परम पावन जल का आचमन या पान करने वाला मनुष्य कभी भी यमराज की भीषण यातनाओं (नरक) को प्राप्त नहीं होता। उसे पुनर्जन्म के चक्र और मृत्यु के भय का सामना नहीं करना पड़ता। हे माँ! मेरा मन सर्वदा आपके परम पावन एवं सुंदर पादरूप में ही अनुरक्त रहे, मैं आपको निरंतर नमन करता हूँ।

गूढ़ रहस्य: यमराज माँ यमुना के भ्राता हैं। इसलिए जो जीव माँ यमुना की शरण में जाता है, यमराज उस पर कभी अपनी क्रूर दृष्टि नहीं डालते, अपितु उसे अभय पद प्राप्त होता है।

शास्त्रीय पाठ / जप विधि, नियम, शुभ मुहूर्त एवं सावधानियां

श्री यमु्राष्टकम् का पाठ अत्यंत फलदायी और शीघ्र फल देने वाला सिद्ध स्तोत्र है। शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार इसका पाठ करते समय निम्नलिखित विधियों एवं नियमों का पालन करना चाहिए:

पाठ की शास्त्रीय विधि:

  • शुद्धि एवं स्नान: प्रात:काल ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः ४:०० से ६:०० बजे) में स्नान करके स्वच्छ वस्त्र (अधिमानतः नीले, श्वेत या पीत वस्त्र) धारण करें।
  • आसन एवं दिशा: कुशा या ऊन के पवित्र आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  • चित्र / विग्रह स्थापना: अपने सामने माँ यमुना जी अथवा श्री राधा-कृष्ण का सुंदर चित्र या विग्रह स्थापित करें। उनके समक्ष शुद्ध गाय के घी का दीपक और धूपबत्ती जलाएं।
  • आचमन एवं संकल्प: हाथ में जल लेकर तीन बार आचमन करें और माँ यमुना जी से अपनी मनोकामना तथा अनन्य भक्ति की प्राप्ति का संकल्प लें।
  • पुष्प एवं तुलसी अर्पण: माँ यमुना जी के चरणों में कमल, चमेली या ताजे पुष्प तथा श्री कृष्ण के लिए तुलसी पत्र अर्पित करें।

उत्तम मुहूर्त एवं विशेष अवसर:

विशेष अवसर / पर्वशास्त्रीय महत्व & पाठ फल
यमुना छठ (चैत्र शुक्ल षष्ठी)माँ यमुना का प्राकट्य दिवस; इस दिन १०८ पाठ करने से समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।
यम द्वितीया (कार्तिक शुक्ल द्वितीया)भैया दूज पर यमुना स्नान व पाठ से अकाल मृत्यु व यम-यातना से मुक्ति मिलती है।
कार्तिक मास & वैशाख मासइन महीनों में नित्य सूर्योदय से पूर्व पाठ करने से अनंत गुणा पुण्य मिलता है।
प्रत्येक एकादशी व पूर्णिमाभगवत्-प्रीति और मानसी सेवा में सिद्धि प्राप्त होती है।

सावधानियां एवं नियम:

  • पाठ करते समय उच्चारण पूर्णतः शुद्ध होना चाहिए। यदि संस्कृत उच्चारण में कठिनाई हो, तो अर्थ को समझकर धीरे-धीरे पाठ करें।
  • श्री यमु्राष्टकम् का पाठ करते समय मन में किसी के प्रति द्वेष, क्रोध या असत्य भाव न रखें।
  • यमुना जी के जल को कभी अपवित्र न करें और न ही उसमें गंदगी प्रवाहित करें। जल संरक्षण और नदी की स्वच्छता का संकल्प लें।

नित्य पाठ के दिव्य फल, लाभ एवं फलश्रुति

श्रीमद् वल्लभाचार्य महाप्रभु जी ने स्वयं इस अष्टक की फलश्रुति में बताया है कि जो मनुष्य नित्य प्रेमपूर्वक श्री यमु्राष्टकम् का गायन या पाठ करता है, उसे निम्नलिखित अलौकिक लाभ प्राप्त होते हैं:

यम-भय एवं नरक से मुक्ति

सूर्यपुत्री एवं यम-भगिनी होने के कारण माँ यमुना अपने पाठकों को यमराज के दंड से बचाती हैं। नित्य पाठ करने वाले साधक को अकाल मृत्यु और नरक की यातनाओं का भय कभी नहीं सताता।

श्री कृष्ण-चरणों में अनन्य प्रेम (पुष्टि)

इस स्तोत्र का सबसे बड़ा फल है - भगवान श्री कृष्ण के श्री चरणों में रागात्मिका भक्ति की प्राप्ति। साधक का चित्त सांसारिक विषयों से हटकर नित्य श्रीकृष्ण-रस में लीन हो जाता है।

समस्त पापों का समूल नाश

जन्म-जन्मांतरों के संचित पाप, दुराचार और मानसिक विकार यमुना जी के जल-बिंदुओं के स्मरण और इस अष्टक के नित्य जप से भस्म हो जाते हैं।

मन की शांति एवं मति-शुद्धि

सांसारिक चिंता, अवसाद, पुत्र-मित्र-धन के मोह से उत्पन्न मानसिक अशांति दूर होती है और साधक को अलौकिक आत्मिक शांति प्राप्त होती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions)

प्रश्न १: श्री यमु्राष्टकम् की रचना किसने की थी?
उत्तर: श्री यमु्राष्टकम् की रचना पुष्टिमागिीय प्रवर्तक श्रीमद् वल्लभाचार्य महाप्रभु जी ने की थी। उन्होंने माँ यमुना जी की दिव्य कृपा और स्वरूप की अनुभूति करके इस अलौकिक स्तोत्र की रचना की।
प्रश्न २: श्री यमु्राष्टकम् का पाठ करने का सबसे उत्तम समय क्या है?
उत्तर: श्री यमु्राष्टकम् का पाठ प्रात:काल ब्रह्म मुहूर्त में या स्नान के पश्चात् करना अत्यंत फलदायी माना जाता है। यमुना जी में स्नान करते समय या संध्या काल में श्री कृष्ण-यमुना जी की आरती के समय पाठ करना सर्वश्रेष्ठ है।
प्रश्न ३: क्या बिना यमुना तट पर गए भी इस अष्टक का लाभ मिलता है?
उत्तर: हाँ, यदि आप यमुना तट पर प्रत्यक्ष उपस्थित नहीं हो सकते, तो घर के पूजन गृह में माँ यमुना और श्री कृष्ण का ध्यान करते हुए तथा जल में गंगा-यमुना का स्मरण कर भावपूर्ण पाठ करने से समान दिव्य फल प्राप्त होता है।
प्रश्न ४: श्री यमु्राष्टकम् के नित्य पाठ से क्या मुख्य आध्यात्मिक लाभ होता है?
उत्तर: इसके नित्य पाठ से साधक के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं, यम-यातना (नरक भय) का अंत होता है, और भगवान श्री कृष्ण चरणों में अनन्य प्रेम एवं पुष्टि (भगवत्कृपा) की प्राप्ति होती है।
प्रश्न ५: क्या महिलाएं और बालक भी श्री यमु्राष्टकम् का पाठ कर सकते हैं?
उत्तर: जी हाँ, माँ यमुना करुणामयी जगन्माता हैं। सभी स्त्री, पुरुष, वृद्ध और बालक पूर्ण श्रद्धा और पवित्रता के साथ श्री यमु्राष्टकम् का नित्य पाठ कर सकते हैं।

॥ जय श्री यमुना जी की! जय श्री कृष्ण! ॥

संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 03 Nov 2026

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